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टीकमचंद राजपुरोहित हत्याकांड मामले की पुख्ता जांच हो - *विधायक राजपुरोहित।*

टीकमचंद राजपुरोहित हत्याकांड मामले की पुख्ता जांच हो - *विधायक राजपुरोहित।*

जालोर,

आहोर के खेतेश्वर कॉलोनी निवासी टीकमचंद राजपुरोहित के हत्याकांड मामले की पुख्ता जांच करवाने को लेकर आहोर विधायक छगनसिंह राजपुरोहित समाज के प्रबुद्धजनों के साथ पुलिस अधीक्षक जालोर से मिले, जिसमे विधायक छगनसिंह राजपुरोहित ने कहा कि टीकमचंद राजपुरोहित की हत्या के आठ माह गुजरने के बाद भी पुलिस ने अपराधियों को नहीं पकड़ पाने से पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल सका है इसलिए आप इस मामले को संज्ञान में लेकर पुख्ता जांच शुरू करवाकर टीकमचंद राजपुरोहित के परिवार को न्याय दिलावे, इस दौरान एडवोकेट गोपालसिंह राजपुरोहित, गोरधनसिंह सांकरणा, करणसिंह थांवला, भोपालसिंह सहित कई लोग मौजूद रहे।

आसोतरा धाम के ट्रस्टी हेमसिंह राजपुरोहित का निधन, सात बेटियों ने दिया शव यात्रा को कन्धा, दी मुखाग्नि

सीमांत बाड़मेर जिला जहां से शिक्षा के अभाव और रूढ़ीवादिता की कहानियां अब खत्म होने लगी है और बेटियां ऐसे उदाहरण पेश कर रही है जिससे समाज में बेटे-बेटी के भेदभाव की स्थितियां खत्म हो रही है। सीमांत जिला 1000 बेटों पर 992 बेटों के आंकड़े तक पहुंचकर भ्रूणहत्या के अभिशाप को धो रहा है तो समाज में बेटे-बेटी के बराबर होने की मिसाल पेश कर रहा है इसी समय में अब बेटियां अपने पिता के अंतिम संस्कार में अर्थी को कांधा देकर भी यह भावना सामने ला रही है कि बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं। महाबार गांव के पूर्व सरपंच, राजपुराहित समाज के मौजिज व्यक्ति और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत के राजनीतिक मित्र हेमसिंह राजपुरोहित की अर्थी को रविवार को उनकी सातोंं बेटियों ने कांधा दिया तो समाज में एक नई और प्रेरणादायक सोच सामने आई। राजपुरोहित समाज के अखिल भारत स्तरीय आसोतरा मंदिर ट्रस्ट के आजीवन सदस्य राजपुरोहित जी  समाज के भारत स्तर के समाजसेवियों में माने जाते है। उनका निधन शनिवार को हो गया। हेमसिंह के सात बेटियां है। पिता के निधन के बाद रविवार को गांव में अंतिम संस्कार हुआ तो सातों बेटियां अर्थी को कांधा देने पहुंची और उन्होंने यहां पिता को मुखाग्रि दी। उनकी चिता के सात फेरे लगाकर अंतिम विदाई दी। सातों बेटियों मगूकंवर, छगनकंवर, तीजोंकंवर, पूरीकंवर, सारी कंवर, धापूकंवर, धाईकंवर ने पिता को अंतिम विदाई दी।
यह है यहां रिवाज
रूढीवादी रिवाज के मुताबिक बेटियां यहां श्मशान तक नहीं जाती है। बेटियों और बहूओं को घर में ही रहकर परिजन के निधन पर बैठना होता है। इलाके में यह पहला मौका था कि बेटियों ने अपने पिता की अंतिम यात्रा में घर से बाहर आई और कहा कि वे भी पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होगी। यहां मौजूद लोगों ने इस पर कोई ऐतराज करने की बजाय इसको सराहा और बेटियों को पिता की अंतिम यात्रा में न केवल शामिल किया उनके हाथ से ही अंतिम संस्कार व अन्य रीति रिवाज संपन्न करवाए।
मिसाल बना है पहले भी समाज
राजपुरोहित समाज ने इससे पहले आसोतरा मंदिर में संकल्प लिया कि समाज में नशावृत्ति पर प्रबंध लगाया जाएगा। सामाजिक कार्यक्रम में नशा नहीं लिया जाएगा। समाज की इस प्रेरणा से समाज में नशावृत्ति पर बड़े स्तर पर असर नजर आया है। अधिकांश लोग अब नशावृत्ति से परहेज करने लगे है। इसी तरह समाज में शिक्षा और संस्कार को लेकर भी लगातार प्रयास किए जाने लगे है। सामाजिक परिवर्तनों की पहल में समाज ट्रस्ट के साथ ही समाज के अगुवा लोगों की भूमिका सामने आ रही है

मुकेश राजपुरोहित आत्महत्या मामले की CBI जांच हो सुरेश नोरवा ।

 भगवा स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश नोरवा, ने सरकार से मुकेश राजपुरोहित आत्महत्या मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की ।
। सुरेश नीरवा ने फेसबुक लाईव के माध्यम से  सरकार से मामले पर सीबीआई से जांच कराने की मांग की। 
सुरेश नोरवा ने कहा कि मुकेश लुदराडा की मौत के जिम्मेदार उसकी बहन का अपहरण कर ले जाने वाला व्यक्ति है

गौरतलब है कि  कुश दिन पूर्व लुदराडा गांव (बाडमेर)  के   समाज के एक बेटे ने खुद पर  केरोसिन उडेल मौंत को गले लगा लिया था ।
.,मिली जानकारी के अनुसार मुकेश.राजपुरोहित लुदराडा  जिसके पिता विशनजी की 20 साल.पहले मौत हो गयी थी, 
माँँ की  भी कुछ साल पहले  स्वर्ग वाश हो गया था     .....मजबूरीवश मुकेश 12-13साल की उम्र मे ही मजदूरी के लिए परदेश  चला गया ,  और  अपनी छोटी बहन को पढाया, पाला पोषा और बडा किया ,
कुश दिन पूर्व ..  बहन को सिवाना का *प्रेमस़िह पुत्र  कोलसिंह* पांचलोड शादी की नियत से ले भागा।    ....
     ., लुदराडा से बहन को भगाने वाला प्रेमसिंह पहले से विवाहित था । उसकी 13 जुलाई 2013 इंद्राणा में शादी हो रखी थी , लेकिन उसको घर से निकाल दिया था ।

मुकेश ने आरोपी प्रेमसिंह और.उसके परिवार से अपनी बहन को लौटाने की काफी मन्नते की लेकिन नही माने, ..
 बहन को भी मनाने की  कोशिश की, लेकिन वो भी नही मानी, समाज से मदद मांगी, समाज के कुछ बंधू सिवाना आरोपी  के घर.गये, लेकिन उन लोगो ने समाज की एक भी  नही सुनी,....।। पुलिस द्रारा कार्रवाई नही करने के साथ उल्टा उन्हें धमकाए जाने पर युवक ने 
निराश हताश मुकेश अपनी इकलौती बहन को लेकर बहुत दुखी था.दुखी होकर खूद पर केरोसिन डाल आत्महत्या कर दी।।

क्या राजपुरोहित समाज एक अनाथ दिवंगत की आत्मा को न्याय देगा* ?

*राजपुरोहित समाज एक अनाथ दिवंगत की आत्मा को न्याय देगा* ?       

बात है, लुदराडा गांव (बाडमेर)   की, जहा आज एक समाज के बेटे ने खुद पर  केरोसिन उडेल मौंत को गले लगाया.....,
 मुकेश.राजपुरोहित लुदराडा  जिसके पिता विशनजी की 20 साल.पहले मौत हो गयी थी, माँँ की  भी कुछ साल पहले मौंत हो गयी     .....मजबूरीवश मुकेश 12-13साल की उम्र मे ही मजदूरी के लिए परदेश गया ,  और  अपनी छोटी बहन को पढाया, पाला पोषा और बडा किया , ..अब  बहन को सिवाना का *प्रेमस़िह पुत्र  कोलसिंह* पांचलोड शादी की नियत से ले भागा।    ....
     प्रेमसिंह पहले से शादीशुदा था......, 

मुकेश ने आरोपी प्रेमसिंह और.उसके परिवार से अपनी बहन को लौटाने की काफी मन्नते की लेकिन नही माने, ..
 बहन को भी मनाने की  कोशिश की, लेकिन वो भी नही मानी, समाज से मदद मांगी, समाज के कुछ बंधू सिवाना आरोपी  के घर.गये, लेकिन उन लोगो ने समाज की एक भी  नही सुनी,....।।
निराश हताश मुकेश अपनी इकलौती बहन को लेकर बहुत दुखी था.दुखी होकर खूद पर केरोसिन डाल आत्महत्या कर दी।।


समाज से निवेदन कि मुकेश बेचारा जिंदगी छोड चला गया ,लेकिन अब उस नीच हरामी सिवाना वाले प्रेमसिंह और उसके पिता कोलसिंह तथा पूरे परिवार पर नकेल कसो, और.उन हरामियो को ऐसा दंड दो, कि आगे से समाज मे किसी का घर नही उजडे.....
मुकेश विशनसिंह का इकलौता बेटा  था,  आज मुकेश के चले जाने के बाद लुदराडा के उस आंगन मे कोई नही बचा....
कितना ह्रदयविदारक और दर्दनाक घटनाक्रम हुआ,..रूंह कांप जाती है।.

  ईश्वर समाज के लाडले मुकेश की आत्मा को न्याय दें..ः।

सिवाना दैनिक भास्कर रिपोर्टर जोगसिह राजपुरोहित अब इस दुनिया मे नही रहे ।

दुखद समाचार

: बाड़मेर जिले के सिवाना में दैनिक भास्कर के संवाददाता जोगसिंह राजपुरोहित  ने आत्महत्या कर अपना जीवन समाप्त कर लिया है। 

प्राप्त जानकारी के अनुसार सोमवार को जोगसिंह भीमसिह रायगुरू राजपुरोहित पादरू ने आत्महत्या की है, जिसके बाद सिवाना पुलिस मौके पर पहुंची है। आत्महत्या के कारणों का खुलासा नहीं हुवा है।

युवा पत्रकार द्वारा आत्महत्या करने से समाज में हर कोई स्तब्ध है। राजस्थान के पत्रकार जगत में भी इस घटना से निराशा छा गयी है लोग सोशल मीडिया पर मृतक पत्रकार को श्रद्धांजलि देकर दुःख प्रकट कर रहे है।



पत्रकार वीरेन्द्र राजपुरोहित - मुझ पर "नेपोटिज्म" का इस्तेमाल कर मुझे बार बार नीचा दिखाकर एक षड्यंत्र के तहत मुझे आत्महत्या करने के लिए उकसा रहे है ।


   पत्रकार वीरेन्द्र राजपुरोहित ने कहा कि  पाली पुलिस और अन्य प्रशासनिक अधिकारी और नेता ओर कई "पत्रकार" साथी भी मुझ पर  "नेपोटिज्म" का इस्तेमाल कर मुझे बार बार नीचा दिखाकर  एक षड्यंत्र के तहत मुझे आत्महत्या करने के लिए उकसा रहे है ।* 

*लेकिन में "आत्महत्या"बिल्कुल नहीं करूंगा....*

*अंतिम सांस तक संघर्ष करूँगा ओर भ्रष्टाचारियो ,अत्याचारियों ओर इंसान की खाल में नरभक्षी भेड़ियों ओर पत्रकार के रूप में काम कर रहे चाटुकारों ओर दलालों की दरिन्दगी को उजागर करता रहूंगा।*

*कोन कोन लोग है आखिर क्यों कर रहे है "नेपोटिज्म" का इस्तेमाल बहुत जल्द बताऊंगा आपको......🙏* 


*आपका ही*✍
*वीरेन्द्र राजपुरोहित*
*संवेदनशील पत्रकार*
*जयपुर/पाली*

पत्रकारिता पर संकट"

"पत्रकारिता पर संकट"

"पाली जिले के SP और जोधपुर रेंज के IG नहीं दे पाएंगे इन सवालों के जवाब..."

"दोषी पुलिसकर्मी के दण्डित होने तक पत्रकार नहीं रुकें और जनता को अपनी कलम से जगाएँ...

राजस्थान के पाली जिले के ईमानदार और संवेदनशील पत्रकार श्री वीरेन्द्र राजपुरोहित (9024985089) को, झूठे मुक़दमे में फँसाने का प्रमुख कारण, एक श्रमिक नेता श्री रामनाथ सिंह की हत्या पर खबर करना है...इस हत्या का आरोप पुलिसकर्मियों पर ही है और न्यायालय के आदेश से "न्यायिक जाँच" भी शुरू हो चुकी है...

याद रखिएगा आज इस पत्रकार को फँसाया गया है और कल किसी अन्य पत्रकार का नम्बर आएगा...

सवाल यह पूछे जाएं :

1. कानून के जानकारों का मानना है कि, पत्रकार वीरेन्द्र राजपुरोहित द्वारा भेजे गए व्टाट्सएप्प संदेश पर कोई संज्ञेय अपराध कारित नहीं हुआ तो कोतवाली थानाधिकारी ने पत्रकार के खिलाफ किस मंशा से आपराधिक मुकदमा दर्ज किया है ?

2. देशभर से कई जागरूक नागरिकों द्वारा एसपी पाली के ध्यान में यह मामला लाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं करने से उनकी मिलीभगती साबित हो रही है, ऐसे में क्या उन जागरूक नागरिकों के खिलाफ भी मुकदमे दर्ज किए जाएंगे ? 

3. पुलिस और श्रमिकों के बीच हुई झड़प के दौरान श्रमिक नेता रामनाथ सिंह वहां मौजूद नहीं थे (सीसीटीवी फुटेज मौजूद है), फिर बिना किसी साक्ष्य और सबूत के पुलिस ने किसके इशारे पर उनको घर से उठाकर गिरफ्तार किया ?

4. पुलिस थाने के अंदर गार्डन में श्रमिक नेता के साथ बैसबॉल के बल्ले से पिटाई की तस्वीरें मीडिया में छपी है, पुलिस थाने में कायदे-कानून और मानवाधिकारों के ऐसे उल्लंघन पर पत्रकार वीरेन्द्र राजपुरोहित द्वारा एसपी को सूचित किए जाने के बावजूद एसएचओ के खिलाफ कार्रवाई नहीं किए जाने की क्या वजह है ?

5. न्यायिक अभिरक्षा में संदिग्ध मृत्यु के शिकार रामनाथ सिंह की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गंभीर चोटों की बात सामने आ रही है, जिससे पुलिस अभिरक्षा में उनके साथ मारपीट की संभावनाओं की पुष्टि होती प्रतीत हो रही है ? पुलिस के इस अमानवीय और बर्बर रवैये पर अब तक क्या कार्रवाई की गई है ?

6. मृतक श्रमिक नेता के पुत्र ने पाली पुलिस अधीक्षक को जिले के तीन थानाधिकारियों, मील प्रशासन सहित सात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की इत्तिला दी थी, हत्या जैसे गंभीर मामले में तीन दिन बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है... जबकि उस पर खबर करने वाले पत्रकार पर तत्काल मुकदमा दर्ज हो रहा है। पुलिस का यह दोहरा रवैया न्याय और नीति के खिलाफ नहीं है ?

राजस्थान पुलिस पर आपत्तिजनक टिप्पणी के आरोप में पत्रकार राजपुरोहित के ख़िलाफ़ मानहानि का केस दर्ज

जयपुरः राजस्थान के पाली जिले में एक पत्रकार के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज किया गया है. पुलिस हिरासत में एक मजदूर नेता की मौत को लेकर स्थानीय पुलिस से सवाल-जवाब करने और कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने के लिए पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.

‘न्यूज 30 राजस्थान’ नाम से वेब चैनल चलाने वाले और कुछ स्थानीय समाचार पत्रों से जुड़े पत्रकार वीरेंद्र राजपुरोहित के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पाली के कोतवाली एसएचओ गौतम जैन की शिकायत के आधार पर पत्रकार राजपुरोहित के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है.

मालूम हो कि 13 मई को पाली में एक कपड़ा मिल ‘महाराजा श्री उम्मेद मिल्स लिमिटेड’ के प्रबंधन का मजदूरों के साथ वेतन को लेकर विवाद हो गया. पुलिस जब मौके पर पहुंची तो मजदूरों ने कथित तौर पर पत्थरबाजी करनी शुरू कर दी थी.

इसके बाद 68 वर्षीय मजदूर नेता रामनाथ सिंह सहित 22 लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा दिया गया. रामनाथ को बाद में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मौत हो गई.

पत्रकार राजपुरोहित का कहना है कि जिस कॉन्स्टेबल ने कथित तौर पर सिंह को पीटा था, उसे बाद में सस्पेंड कर दिया गया.

विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया और राज्य के भाजपा अध्यक्ष सतीश पुनिया ने डीजीपी को पत्र लिखकर मांग की है कि सिंह की मौत के संबंध में हत्या के मामले में एफआईआर दर्ज की जाए.

राजपुरोहित के खिलाफ दर्ज एफआईआर के मुताबिक, ‘पत्रकार ने 26 मई को एसएचओ जैन को एक वॉट्सएप मैसेज किया था, जिसमें उन्होंने पाली के एसपी राहुल कटेकी को असंवेदनशील और अहंकारी बताया था.’

राजपुरोहित ने मैसेज में कहा था कि उन्होंने मजदूर नेता रामनाथ सिंह के बारे में एसपी को सूचना दी थी कि किस तरह सिंह को बेसबॉल बैट से पीटा गया, लेकिन एसपी ने उनका नंबर ब्लॉक कर दिया.

राजपुरोहित का आरोप है कि इस मामले में एसपी की भूमिका संदिग्ध है.

एफआईआर में कहा गया है कि पत्रकार राजपुरोहित ने एसपी और स्थानीय पुलिस के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया.

राजपुरोहित के खिलाफ आईपीसी की धारा 388, 116, 500, 501, 506 और आईटी एक्ट की धारा के तहत मामला दर्ज किया गया है.

राजपुरोहित ने कहा, ‘मैंने मजदूर नेता की मौत का मामला उठाया इसलिए पुलिस मुझे निशाना बना रही है और मेरे खिलाफ गलत तरीके से एफआईआर दर्ज की गई है.’

उन्होंने कहा, ‘स्थानीय भाजपा नेताओं को संभाल लिया गया लेकिन ये मुझे नहीं संभाल सके और मैं लगातार मामले को उठाता रहा. इसलिए मुझे निशाना बनाया जा रहा है और मैं फिलहाल छिपा हुआ हूं.’

एसपी कटेकी ने कहा, ‘वीरेंद्र राजपुरोहित के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. आप खुद समझ सकते हैं कि अगर किसी आईपीएस अधिकारी के खिलाफ इस तरह की अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जाता है तो क्या उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की जरूरत है.’

इस बीच रामनाथ सिंह के बेटे बृजमोहन सिंह ने शुक्रवार को जोधपुर रेंज के आईजी के पास शिकायत दर्ज कराते हुए पिता की मौत को लेकर एसपी और अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग की है.।

वही एडवोकेट गोवर्धन सिंह राजस्थान उच्च न्यायालय,

जयपुर ने कहा कि  "पुलिस द्वारा दर्ज कराई गई सबसे घटिया FIR...है ।"





नोट : पढ़ने के लिए FIR संलग्न है...




पत्नी ने पति की हत्या कर जमीन में गाड़ा शव, दामाद की सूचना पर पुलिस ने किया पर्दाफाश

पाली/सादड़ी। जिले के सादड़ी थाना क्षेत्र के मादा गांव में पत्नी ने पति की हत्या कर शव को फार्म हाउस की जमीन में दफना दिया। मृतक के दामाद की रिपोर्ट पर पुलिस और प्रशासन सिंदरली सडक़ मार्ग पर स्थित कृर्षि फार्म हाऊस पर पहुंचकर शव को बाहर निकाला। पुलिस ने आरोपी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया। घटना 12 दिन पुरानी बताई जा रही है। पत्नी का कहना है कि वह अपने पति की शराबी आदत से परेशान थी, इस कारण उसने हत्या की। पुलिस मामले की जांच कर रही है।

थानाधिकारी गिरधर सिंह के अनुसार मादा निवासी मृतक हमेरसिंह पुत्र भोपालसिंह राजपुरोहित व उसकी पत्नी कमला देवी गांव में रहते थे। हमेर सिंह शराब अधिक पीता था, इससे पत्नी परेशान थी। 12 दिन पूर्व उसने अपने फार्म हाउस पर नींद में सो रहे पति हमेर सिंह पर सरीए से वारकर हत्या कर दी और वहीं रजाई में शव लपेटकर जमीन में दफना दिया।

हमेर सिंह का दामाद अशोक सिंह राजपुरोहित मंगलवार को अपनी पत्नी रिंकू के साथ मादा गांव ससुराल आया। यहां सास कमला से सुसर को लेकर पूछताछ करने पर सास कमला ने दामाद को बताया कि उनकी हत्या कर शव को कृषि फार्म हाऊस में दफना दिया। दामाद ने पुलिस प्रशासन को सूचना दी। इस पर पुलिस मौके पर पहुंची। पत्नी की बताई जगह से शव बाहर निकाला।

पत्नी ने ही बुलाया दामाद व पुत्री को
कमला का दामाद सूरत रहता है। वह लॉक डाउन के कारण अपने घर आया हुआ था। गत छह दिन पूर्व सास कमला ने अपने दामाद व पुत्री को मोबाइल कॉल कर कहा कि उसके पिता घर पर नहीं अ रहे हैं, इस पर दामाद व पुत्री वहां आए, उनके आने पर हकीकत बता दी। मौके पर ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई। दामाद की रिपोर्ट पर पुलिस ने कमला के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है।

भगवान परशुराम जी की कथा।

परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) में एक ब्राह्मण ऋषि के यहां जन्मे थे। जो विष्णु के छठा अवतार है[1]। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को मध्यप्रदेश के इंदौर जिला में ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत में हुआ था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए। वे जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शार्ङ्ग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।

भगवान परशुराम
Parashurama.jpg
भगवान परशुराम।
संबंध स्वयं भगवान
निवासस्थान महेन्द्रगिरि
अस्त्र परशु (फरसा)
जीवनसाथी धारिणी
शास्त्र भागवत पुराण, विष्णु पुराण, रामायण, रामचरितमानस

राजा रवि वर्मा द्वारा परशुराम जी का चित्र।
वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।" वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है।

पौरोणिक परिचय

परसुराम की प्रतिमा
परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराणऔर कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं[2]। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण, गोवा एवं केरल का समावेश है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने तिर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पिछे धकेल ते हुए नई भूमि का निर्माण किया। और इसी कारण कोंकण, गोवा और केरला मे भगवान परशुराम वंदनीय है। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना। वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे।

उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी। लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण।

उनके जाने-माने शिष्य थे -

भीष्म
द्रोण, कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता एवं
कर्ण।
कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है। वह सदैव ही स्वयं को शुद्र समझता रहा लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न रह सका। उन्होन परशुराम को यह बात नहीं बताई की वह शुद्र वर्ण के है। और भगवान परशुराम से शिक्षा प्राप्त कर ली। किन्तु परशुराम वर्ण व्यवस्था को अनुचित मानते थे। यदि कर्ण उन्हे अपने शुद्र होने की बात बता भी देते तो भी भगवान परशुराम कर्ण के तेज और सामर्थ्य को देख उन्हे सहर्ष शिक्षा देने को तैयार हो जाते। किन्तु जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने सामने होते है तब वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।

इतिहास
जन्म
प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्‍चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्‍वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपलका आलिंगन करना और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना। इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्‍ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी। इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्‍वानस और परशुराम।

माता पिता भक्त परशुराम
श्रीमद्भागवत में दृष्टान्त है कि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।

अन्य भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेद एवं उन्हें बचाने हेतु आगे आये अपने समस्त भाइयों का वध कर डाला। उनके इस कार्य से प्रसन्न जमदग्नि ने जब उनसे वर माँगने का आग्रह किया तो परशुराम ने सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने सम्बन्धी स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर माँगा।

पिता जमदग्नि की हत्या और परशुराम का प्रतिशोधसंपादित करें

Parasurama killing Sahasrarjuna.jpg सहस्त्रार्जुन से युद्धरत परशुराम का एक चित्र
कथानक है कि हैहय वंशाधिपति का‌र्त्तवीर्यअर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर ले गया।

कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से पृथक कर दिया। तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया। यही नहीं उन्होंने हैहय वंशी क्षत्रियों के रुधिर से स्थलत पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर भर दिये और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका।

इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे।

हैहयवंशी क्षत्रियों का विनाश
माना जाता है कि परशुराम ने 21 बार हैहयवंशी क्षत्रियों को समूल नष्ट किया था। क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है यह समाज आज भी है। इसी समाज में एक राजा हुआ था सहस्त्रार्जुन। परशुराम ने इसी राजा और इसके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके लिए 21 बार युद्ध करना पड़ा था।

कौन था सहस्त्रार्जुन ?: सहस्त्रार्जुन एक चन्द्रवंशी राजा था जिसके पूर्वज थे महिष्मन्त। महिष्मन्त ने ही नर्मदा के किनारे महिष्मती नामक नगर बसाया था। इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरान्त कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को सम्हाला। भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे। भार्गव प्रमुख जमदग्नि ॠषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर सम्बन्ध थे। कृतवीर्य के पुत्र का नाम भी अर्जुन था। कृतवीर्य का पुत्र होने के कारण ही उन्हें कार्त्तवीर्यार्जुन भी कहा जाता है। कार्त्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था। भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्त्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन या सहस्रबाहु कहा जाने लगा। सहस्त्रार्जुन के पराक्रम से रावण भी घबराता था।

युद्ध का कारण: ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।

तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि को मार डाला। परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-"मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा"। उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध किया। क्रोधाग्नि में जलते हुए परशुराम ने सर्वप्रथम हैहयवंशियों की महिष्मती नगरी पर अधिकार किया तदुपरान्त कार्त्तवीर्यार्जुन का वध। कार्त्तवीर्यार्जुन के दिवंगत होने के बाद उसके पाँच पुत्र जयध्वज, शूरसेन, शूर, वृष और कृष्ण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे।

दन्तकथाएँ
ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथानक मिलता है कि कैलाश स्थित भगवान शंकर के अन्त:पुर में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके जाने पर परशुराम ने बलपूर्वक अन्दर जाने की चेष्ठा की। तब गणपति ने उन्हें स्तम्भित कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों का भ्रमण कराते हुए गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कराके भूतल पर पटक दिया। चेतनावस्था में आने पर कुपित परशुरामजी द्वारा किए गए फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दाँत टूट गया, जिससे वे एकदन्त कहलाये।

रामायण काल

एक पौरोणिक चित्र: श्रीराम (दायें) और परशुराम (बाएँ)
उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को "विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही" बताते हुए "बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये" और क्रोधान्ध हो "सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा" तक कह डाला। तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए "अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता" तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- "कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू"। वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

जाते जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।

महाभारत कालसंपादित करें
भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके।

परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे। किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे। तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा। तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके। परशुरामजी ने कहा-"एवमस्तु!" अर्थात् ऐसा ही हो। इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।

परशुराम कर्ण के भी गुरु थे। उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था। लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था, फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से विधा लेने का प्रयास किया। परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं, लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे, तब एक भौंरा आकर कर्ण के पैर पर काटने लगा, अपने गुरुजी की नींद में कोई अवरोध न आये इसलिये कर्ण भौंरे को सेहता रहा, भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, भौरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा। वो खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा। परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा। इस घटना के कारण कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का लाभ नहीं मिल पाया।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार गुरु परशुराम कर्ण की एक जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे। तभी एक बिच्छू कहीं से आया और कर्ण की जंघा पर घाव बनाने लगा। किन्तु गुरु का विश्राम भंग ना हो, इसलिये कर्ण बिच्छू के दंश को सहता रहा। अचानक परशुराम की निद्रा टूटी और ये जानकर की एक ब्राम्हण पुत्र में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती कि वो बिच्छू के दंश को सहन कर ले। कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह उसके काम नहीं आयेगी।

विष्णु अवतारसंपादित करें
भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को विश्ववन्द्य महाबाहु परशुराम का जन्म हुआ था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे।

कल्कि पुराणसंपादित करें
कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। वे ही कल्कि को भगवान शिव की तपस्या करके उनके दिव्यास्त्र को प्राप्त करने के लिये कहेंगे।

मार्शल आर्ट में योगदानसंपादित करें
भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के श्रेष्ठ जानकार थे। परशुराम केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली वदक्कन कलरी के संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं।[3] वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली शैली है

सिनला में एक ही परिवार में आटे-साटे को लेकरविवाद, दो गाड़ियों में हमला करने पहुंचा एक पक्ष

सोजत रोड थाना क्षेत्र के सिनला गांव में दो परिवारों में आटे-साटे के विवाद को लेकर दो कारों में भरकर पहुंचे कुछ लोगों ने एक परिवार पर हमला बोल दिया। यह लोग अपने परिवार की युवती को लेने के लिए पहुंचे थे। इससे गांव में माहौल गरमा गया। सोजत रोड थाने से हेड कांस्टेबल पहुंचा, मगर उनके पास कोई वाहन नहीं होने के कारण दोनों युवकों को ग्रामीण निजी वाहन में सोजत रोड थाने ले गए। आरोप है कि इस दौरान एक आरोपी वहां से भाग गया। यह युवक कराड़ी में हुई हत्या के मामले का आरोपी है। वर्तमान में वह जमानत पर चल रहा है। पुलिस ने पीड़ित पक्ष की रिपोर्ट पर मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस का कहना है कि जांच में आरोपी साबित होने पर कार्रवाई की जाएगी। पुलिस के अनुसार सिनला निवासी मंगलसिंह राजपुरोहित की पुत्री का ससुराल मालकोसनी निवासी नारायणसिंह राजपुरोहित के परिवार में है। दोनों ही परिवारों ने अपनी बेटियों की आटे-साटे के तहत शादी कर रखी है। सोमवार को एक पक्ष अपनी बेटी को लेकर सिनला लेकर आ गया था। इसको लेकर विवाद हो गया। पुलिस में दी रिपोर्ट में आरोप लगाया कि मंगलवार को सिनला में दो वाहनों में भरकर कुछ लोग पहुंचे तथा आते ही उसकी बहिन को ले जाने का प्रयास किया। इनमें एक हत्या के मामले का आरोपी आजादसिंह पुत्र लक्ष्मणसिंह राजपुरोहित भी था। विरोध करने पर इन लोगों ने हमला बोल दिया। बताया जाता है कि इस दौरान मंगलसिंह के पुत्र ओमसिंह के चिल्लाने पर वहां पर ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई और आजादसिंह व एक अन्य को पकड़ लिया। सोजत पुलिस के नहीं आने पर दोनों का लेकर सोजत रोड थाने पहुंचे। यहां से आजादसिंह भाग छूटा।

हैदराबाद गैंगरेप : चारों आरोपियों को पुलिस ने एनकांउटर में मार गिराया

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद (Hyderabad) में महिला वेटनरी डॉक्टर से गैंगरेप (Gangrape) के बाद हत्या और शव जलाने के मामले के सभी चारों आरोपियों को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया है. बताया जाता है कि सभी आरोपी भागने के फिराक में थे.नई दिल्ली. तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद (Hyderabad) में महिला वेटनरी डॉक्टर से गैंगरेप (Gangrape) के बाद हत्या और शव जलाने के मामले के सभी चारों आरोपियों को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया है. कहा जा रहा है कि सभी आरोपी भागने के फिराक में थे तभी पुलिस ने उन पर गोली चला दी. बताया जाता है कि यह घटना NH 44 पर हुई है.

बताया जा रहा है कि हैदराबाद गैंगरेप को चारों आरोपी मारे गए हैं. तेलंगाना पुलिस ने चारों आरोपियों का एनकाउंटर कर दिया है. बताया जा रहा है कि पुलिस इन चारों आरोपियों को वारदात की जगह ले जा रही थी, जहां से इन चारों आरोपियों ने भागने की कोशिश की. इसके बाद पुलिस ने चारों आरोपियों का एनकाउंटर कर दिया.गौरतलब है कि 29 नवंबर को हैदराबाद के साइबराबाद टोल प्लाजा के पास एक महिला की अधजली लाश मिली थी. महिला की पहचान एक वेटनरी डॉक्टर के तौर पर हुई थी. पुलिस के मुताबिक, महिला की गैंगरेप के बाद हत्या की गई, फिर लाश को पेट्रोल से जलाकर फ्लाईओवर के नीचे फेंक दिया गया. वारदात में शामिल चारों आरोपियों की पहचान मोहम्मद पाशा, नवीन, चिंताकुंता केशावुलु और शिवा के तौर पर हुई है. पुलिस जांच में पता चला कि आरोपियों ने वारदात को अंजाम देने के लिए साजिश के तहत महिला डॉक्टर की स्कूटी पंक्चर की थी, ताकि वे महिला डॉक्‍टर को अपने जाल में फंसाकर वारदात को अंजाम दे सके.स्कूटी ठीक कराने के बहाने झांसे में फंसाया
पुलिस का कहना है कि चारों आरोपियों ने महिला डॉक्टर को टोल प्लाजा पर स्कूटी पार्क करते देखा था. तभी एक आरोपी शिवा ने उसकी स्कूटी की हवा निकाल दी. जब महिला डॉक्टर फोन पर अपनी बहन को परेशानी बता रही थी, तभी आरोपी चिंताकुंता केशावुलु और शिवा वहां मदद के लिए पहुंच गए. शिवा स्कूटी ठीक कराने के बहाने महिला डॉक्टर को कुछ दूर ले गया, जहां बाकी आरोपी ताक लगाए बैठे थे. जैसी ही महिला डॉक्टर वहां पहुंची, आरोपियों ने उसे बंधक बना लिया.
क्या होता है घटना का रिकंस्ट्रक्शन?


बता दें कि पुलिस केस की छानबीन और सबूत जुटाने के लिए वारदात की जगह पर 'वारदात कैसे घटी' या 'वारदात को कैसे अंजाम दिया गया' इसके लिए घटना का रिकंस्ट्रक्शन करती है. वारदात की जगह आरोपियों को भी ले जाया जाता है ताकि वह बताए कि उन्होंने वारदात को कैसे अंजाम दिया. पुलिस ये सब इसलिए करती है ताकि उसकी तरफ से केस मजबूत हो और वह अदालत में केस से जुड़े सभी पहलुओं को रख सके

राजस्व मंत्री के खिलाफ दृष्टिबाधित का वीडियो वायरल , मंत्री बोले - इस मामले से मेरा कोई लेना - देना नहीं है । पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जाए ,

rajpurohiit news express

 बालोतरा . क्षेत्र के तिरसिंगड़ी गांव के एक दृष्टिबाधित दिव्यांग का वीडियो वायरल हुआ है , जिसमें राजस्व मंत्री हरीश चौधरी सहित अन्य पर जमीन हड़पने के आरोप लगाए गए हैं । दृष्टिबाधित आत्महत्या करने की चेतावनी भी दी है । राजस्व मंत्री ने कहा है कि वीडियो उन्होंने भी देखा है । आरोप गलत है , मामल की निष्पक्ष जांच करवाई जाए । वायरल वीडियो में दिव्यांग तिरसिंगडी निवासी सवाईसिंह पुत्र मेहरसिंह राजपुरोहित ने आरोप लगाया कि खरताराम नाम के एक व्यक्ति ने उसे पेंशन दिलाने के नामधोखाधड़ी कर फर्जी तरीके से उसकी जमीन की तहसील में रजिस्ट्री करवा ली । इसकी एवज में उसे रुपए भी नहीं दिए । मंत्री , उसके भाई व खरताराम ने 7 बीघा जमीन हड़प ली है । दष्टिबाधित का वीडियोएक व्यक्ति ने बनाया है जो इसके बाद बता रहा है कि इस मामले में तीन दिन में कार्यवाही नहीं हुई तो । दृष्टिबाधित आत्महत्या कर लेगा । इनके इर्दगिर्द 15 - 20 अन्य लोग भी बैठे हैं । 








वायरल नहीं मिली शिकायत इस तरह की कोई शिकायत नहीं मिली है । न ही किसी ने आकर प्रशासन को बताया है । - रोहित कुमार , उपखण्ड अधिकारी बालोतरा 






करवाएंगे पता हमें ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली है । मामला है तो पता करवाया जाएगा । - माया पंडित , थानाधिकारी कल्याणपुर 







राजस्व मंत्री के खिलाफ दृष्टिबाधित का वीडियो वायरल ,





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मंत्री बोले - करें जांच तिरसिंगड़ी निवासी है नहीं मिली शिकायतमेरा लेना - देना नहीं वीडियो मैंने भी देखा था । इस मामले से मेरा कोई लेना - देना नहीं है । पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जाए , जो भी दोषी हों , उसके परे मामले की निशान खिलाफ कार्रवाई की जाए । हरीश चौधरी , राजस्व मंत्री

राजपुरोहित प्रतापसिंह जी मूलराजोत सेवड तिंवरी

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राजपुरोहित प्रतापसिंह जी मूलराजोत सेवड तिंवरी 
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परिचय :- प्रताप सिंह जी का जन्म विक्रमी संवत १५५५ कार्तिक मास की पूर्णिमा यानी देव दीपावली को जोधपुर के राजपुरोहित मूलराज जी घर हुआ था! मूलराज जी राव गांगा जी के राजपुरोहित थे ! मूलराज जी दो दर्जन से ज्यादा गांवों के जागीरदार थे ! प्रताप सिंह जी अपने आठ भाइयों मैं सबसे बड़े थे और जोधपुर के राजा मालदेव जी के राजपुरोहित बने थे विक्रम संवत 15 88 में मूलराज जी की हत्या के बाद बने ! 
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भाई :- प्रताप सिंह जी के बड़े पिताजी भोजराज सिंह जी तालकिया और केसुसिंह जी घंटियाला थे , भाई राज सिंह जी विकरलाई , महेश दास जी चाडवास , छता जी धुरासनी , रायसल जी मालपुरिया , भानीदास जी भोजास , रायमल जी , विरम देव जी दोनों शहीद हुए और इनके वंशज नहीं हुए ! प्रताप सिंह जी सबसे बड़े पुत्र थे इसलिए वे तिंवरी में ही रहे और सभी छोटे भाई तिंवरी से बाहर निकल कर सभी ने अपने अपने गांव बसाए यह सभी गांव मूलराज जी को मिले हुए थे  
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पद :- प्रताप सिंह जी राव माल देव जी के राजपुरोहित बने यह पहला अवसर था जब राजा और राजपुरोहत एक साथ एक समय में पद ग्रहण किए क्यू कि राव माल देव जी ने अपने पिता का तख्ता पलट कर दिया और राजा बने थे और मूलराज जी राव गांगा की रक्षा करते हुए किले में शहीद हुए मालदेव जी की सैनिक टुकड़ी के हाथो १५८८ विक्रम संवत में , इस घटना से मालदेव जी दुःखी हुए कि मेरे सैनिकों ने मूलराज जी को मार डाला , तब वे प्रताप जी से माफ़ी मांगी थी उस समय उनकी उम्र केवल २० साल थी और प्रताप जी ३३ साल के थे और साथ साथ ही रहते थे चाहे युद्ध में या किले में जिगरी दोस्त की तरह सभी युद्धो में
भाग लिया और एक बार माल देव जी के साथ आखेट पर भी उनके साथ गए थे तब एक शेर ने अचानक माल देव जी पर हमला किया और उनको दबोच लिया तभी प्रताप जी ने एक वार में भाला आर पार कर शेर को मार डाला और राव जी को बचा लिया था , यह बात कैसरी सिंह जी के जसप्रकास नामक किताब में लिखा हुआ है 
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राव मालदेव जी :- का जन्म वि॰सं॰ 1568 पोष बदि 1 को (ई.स. 1511 दिसम्बर ५) हुआ था। पिता की मृत्यु के पश्चात् वि॰सं॰ 1588 (ई.स. 1531) में सोजत में मारवाड़ की गद्दी पर बैठे। उस समय इनका शासन केवल सोजत और जोधपुर के परगनों पर ही था। जैतारण, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, खेड़, महेवा, सिवाणा, मेड़ता आदि के सरदार आवश्कतानुसार जोधपुर नरेश को केवल सैनिक सहायता दिया करते थे। परन्तु अन्य सब प्रकार से वे अपने-अपने अधिकृत प्रदेशों के स्वतन्त्र शासक थे। मारवाड़ के इतिहास में राव मालदेव का राज्यकाल मारवाड़ का "शौर्य युग" कहलाता है। राव मालदेव अपने युग का महान् योद्धा, महान् विजेता और विशाल साम्राज्य का स्वामी था। उसने अपने बाहुबल से एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। मालदेव ने सिवाणा जैतमालोत राठौड़ों से, चौहटन, पारकर और खाबड़ परमारों से, रायपुर और भाद्राजूण सीधलों से, जालौर बिहारी पठानों से, मालानी महेचों से, मेड़ता वीरमदेव से, नागौर, सॉभर, डीडवाना मुसलमानों से, अजमेर साँचोर चौहाणों से छीन कर जोधपुर-मारवाड़ राज्य में मिलाया। इस प्रकार राव मालदेव ने वि॰सं॰ 1600 तक अपने साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार कर लिया। उत्तर में बीकानेर व हिसार, पूर्व में बयाना व धौलपुर तक एवं दक्षिण-पश्चिम में राघनपुर व खाबड़ तक उसकी राज्य सीमा पहुँच गई थी। पश्चिम में भाटियों के प्रदेश (जैसलमेर) को उसकी सीमाएँ छू रही थी। इतना विशाल साम्राज्य न तो राव मालदेव से पूर्व और न ही उसके बाद ही किसी राजपूत शासक ने स्थापित किया।
तो इस तरह उन्होंने अपने कुटुंबी भाइयों और रिश्तेदारों के राज्य छीन लिए अपने बाहुबल और विस्तारवादी नीति के तहत और वे कभी किसी पर दया नहीं करते थे वे बहुत हठीले और जिद्दी स्वभाव के थे 
किसी की नहीं सुनते थे इसलिए वे हारे हुए सभी राजा उनसे बदला लेने के लिए दिल्ली चले गए शेरशाह सूरी को सब हालात बताए और कहा अब आपकी बारी भी आ सकती हैं इससे पहले आप हमारा साथ दें तो उनको हराकर हम अपने राज्य वापस हासिल कर सकते है और आपके साथ सन्धि रहेंगी आप जो चाहें शर्त रखो तब सुरी राजी हुआ और अपनी सेना लेकर आया उस सेना में शामिल सभी वे राजा थे जिनको माल देव जी ने बे घर किया था इनमें से प्रमुख मेड़ता और बीकानेर के राजा थे 
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सुमेल - गिरी का युद्ध :- राव माल देव जी और शेरशाह सूरी के बीच पाली जिले की सीमा पर सुमेल और गिरी स्थान पर विक्रम संवत १६०० में हुआ दोनों गांवों के बीच दूरी ५-१० किमी है जो कि रास बाबरा जैतारण के पास है और ब्यावर के काफी नजदीक है , और सुरी के साथ राजपुत भी बहुत थे एक तरह से गठबंधन सेना थी और मालदेव जी के साथ कोई राजा नहीं थे फिर भी जोधपुर की सेना ने शुरुवाती दिनों में सूरी की सेना को पछाड़ दिया और १-२ दिन में ही ३५००० सैनिकों को मार डाला खुद के १२०००-१५००० के करीब सैनिकों को खोना पड़ा लेकिन शेरशाह सूरी बहुत डर गया कि वो सभी राजपूत राजाओं को कहने लगा की आप सभी ने मुझे यहां मुठ्ठी भर बाजरे के लिए इतना बड़ा नुकसान करा दिया कुछ दिन अगर ऐसा ही चला तो मै दिल्ली को संभालने के लायक भी नहीं रहूंगा तभी एक करीब १५००० फौज लेकर एक मुस्लिम सहयोगी दल आने की खबर मिलते ही वो रुक गया लेकिन वो सेना २ दिन बाद यहां पहुंचेगी तब तक कोई दूसरा रास्ता निकलने को कहा तब वहां मौजूदा राजपुत राजाओं ने कहा कि आप एक चाल चलो कि यह खबर फैला दो की आपने जैता और कुंपा को अपनी ओर मिला लिया है और वे कल बगावत कर लेंगे और नकली दस्तावेज उनके सिविर में फेंका दिया और एक पत्र माल देव जी के पास भी भेज दिया कि हमने आपके सेनापति जेता ओर कूंपा को अपनी ओर मिला लिया है यह खबर पता चली तो उन्होंने जांच करवाई गई तो जांच में एक तलवार में पत्र मिला ओर उनको सच मानकर माल देव जी बीच युद्ध में से ही रात को अपने ५ हजार सैनिकों के साथ जोधपुर चले जाते है वहां से आगे सिवाना चले जाते है लेकिन वे अपने साथ प्रताप सिंह जी को नहीं लेकर गए थे , उन्होंने पीछे जो सेना बची थी उसका सेनापति नियुक्त करके चले जाते है जिसको विश्वासी सेना कहते हैं ओर वो सेना सिर्फ सुमेल में लड़ी थी , ओर जेता , कुम्पा राठौर को पता चला तो बहुत नाराज़ होकर गिरी स्थान पर मोर्चा बना कर अपने ऊपर लगे गद्दारी का झूठा आरोप कि वजह से ज्यादा गुस्से में थे उन्होंने कहा हम गद्दार नहीं है और हम सब यही लड़कर प्राण त्याग देंगे पर सूरी को आगे नहीं बढ़ने देंगे उनके पास ६००० सैनिक थे ओर प्रताप सिंह जी के पास केवल १५०० सैनिक ही थे लेकिन बहुत दिनों तक सीमा पर लड़ते रहे लेकिन रोज रोज कुछ सैनिक शहीद हो ते गए 
ओर सूरी के पास ज्यादा समय नहीं था व फोज बहुत बड़ी थी तो वो आखिर जीत दर्ज करने में सफल रहा वहा पर लड़ते हुए सभी सैनिक शहीद हो मारवाड़ के प्रताप जी भी ओर जेता कूंपा राठौर भी कोई नहीं बचा था
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सिंह की उपाधि :- जब राव माल देव को पता चला कि सभी बड़े बड़े योद्धा शहीद हो गए है तो वे बहुत निराश हो गए थे , लेकिन प्रताप जी को सिंह का खिताब देकर उनको सम्मान देते है मित्रो इतिहास में तो जेता व कूंपा जी राठौर के बारे में बहुत बड़े शूरवीर थे ऐसा लिखते है , लेकिन प्रताप सिंह जी का नाम भी शामिल नहीं करने वाले इतिहासकारों को सोचना चाहिए कि आखिर राव मालदेव जी ने सिंह की उपाधि पुरोहित प्रताप जी को ही क्यों प्रदान की कुछ तो काबीलियत रही होगी लेकिन कुछ आधुनिक राजपूती विचारधारा के लेखक उनका नाम तक लिखना नहीं चाहते हैं सिर्फ राजपूती आन बान शान बचाने के लिए यह रास्ता ठीक नहीं है , 
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                       प्रताप सिंह जी के दोहे - 
सिंह तणी पदवी सुमेल , रण दी मालो राव ! 
सिंह प्रोहित प्रताप सिंह , रण उबरिया राव !! 
अर्थात :- सिंह की पदवी सुमेल के युद्ध में राव माल देव जी ने दी 
व प्रताप सिंह जी की तुलना शेर से की ओर राव माल देव को युद्ध में बचाया है 

राजपुरोहित दूल्हों पातलो , संभालो रण सुमेल ! 
जेता कुम्पा जोरा रा , झुरी अप्सरा झेल !! 

अर्थात :- राजपुरोहित प्रताप जी आप ही अब इस बारात फोज के दूल्हे 
हो अब आप ही इस युद्ध भूमि सुमेल को संभालो 
जेता कूंपा राठौर भी जोर थे ओर तीनों शूरवीरों को शहीद होने के बाद स्वर्ग की अप्सराए उन्हें लेने के नीचे झुक कर स्वर्ग में लेकर गई हैं 
मुझे इस दोहे का अर्थ कही लिखा नहीं मिला है मैने मेरे अंदाज से लिखा है जो लगभग सही कह सकते हैं  

यह दो दोहे ही काफी है कि प्रताप सिंह जी क्या थे लेकिन लिखने वाले इनका नाम नहीं लिखते उनके मुंह पर जोरदार तमाचा है 
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            प्रताप सिंह जी खुद को मिले गांवो की सुची 

1. चेलावास :- यह गाँव पाली जिले मे है इस गाँव की सालाना  
                  आमदनी 20001 फदिया थी , यह गाँव विक्रम संवत               
                 1588 माघ वदी 12 को राव मालदेव जी ने दिया था 
                 इस गाँव के ताम्रपत्र की नकल मेरे पास है इस गाँव 
                 को प्रताप सिंह जी के वंशजो ने अपना ठिकाना नहीं 
                 बनाया वहां कोई निवास करने नहीं गये क्यूकी प्रताप            
                 सिंह जी के पास लगभग 15 गाँव थे , इसिलिए सभी 
                  गाँव नहीं बसा पाये थे ओर 
                 बाद मे कुछ पीढ़ी बाद निरस्त कर दिये जाते थे 

2. धंवलासर :- यह गाँव जोधपुर जिले मे है इस गाँव को राव  
                    मालदेव जी के ज्येष्ठ पुत्र उदय सिंह जी ने विक्रमी  
                   संवत 1616 जेठ वदी 11 के दिन दिया था प्रताप जी
                   मरणोपरांत उनकी वीरता से प्रभावित होकर दिया था इस गाँव मे भी कोई रहने नहीं गये , इस गाँव के ताम्र पत्र की नकल मेरे पास है  
                

3. मोहवा :- यह गाँव मालदेव जी के पुत्र राव चन्द्रसेन जी ने दिया 
                   था यह गाँव नीवसींव सुधा अर्थात जिस समय गाँव 
                   दिया गया उस समय उसकी जो सीमाये थी उसके 
                  अनुसार दिया गया था , यह गाँव सभी देदवतो ओर  
                  दामावतो को साझा दिया था , परवाने मे निवेवगी तथा 
                  अघाट { सम्पूर्ण आय इनको मिलेगी } इस गाँव की  
                  आय 13000 फदिया सालाना थी , इस को एक अन्य 
                  गाँव इनके पुर्वजो का गाँव काबाला था ज़िसको रद्द 
                  करके यह गाँव काबाला के बदले मे दिया गया है  
                   काबाला गाँव की सालाना आय 20000 फदिया थी  
                  यह गाँव राव चन्द्र सेन जी ने विक्रमी संवत 1620 मे 
                  वैसाख वदी 9 को प्रतापसिंह जी को मरणोपरांत  
                    दिया गया था , इस गाँव को भी नही बसाया गया 
                  
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पुत्र :- प्रताप सिंह जी के 5 पुत्र थे , लेकिन    
          सबके नाम 
         स्पष्ट मालुम नहीं हूए क्युकी 3पुत्रो के 
            वंशज नहीं 
         है ओर तीनो पुत्रो का इतिहास भी नहीं
             मिला इनके
         बारे में कही कोई जानकारी प्राप्त नहीं 
              हुई 
         
       1. ठाकुर कल्याण सिंह जी :- आप सभी
          भाइयो मे 
            बड़े थे ओर पाटवी पुत्र होने के कारण 
           तिंवरी 
         मे रहे ओर राव मालदेव जी ने आपको 
         ठाकुर की 
         पदवी ओर समस्त राजपुरोहितो मे पाटवी
           पद दिया 
         जिसका मतलब होता था कि समस्त
           राजपुरोहितो मे 
         सबसे पहले आपकी बात सुनी जायेगी 
            य़ानी एक 
        मुखिया की तरह , ओर आप जोधपुर 
           रियासत के
        राजपुरोहित पद पर रहे मालदेव जी ओर
          राव 
        चन्द्रसेंन जी के समय आप विक्रम .संवत
        1632 मे   
        चन्द्रसेंन जी 
        की जगह राजा बनकर सिवाना के
         पीपलाणा गाँव के
        पहाडी पर शहीद हूए , इनके सात पुत्र थे 
        ओर आज 11
       गाँवो मे रहते है , 8 गाँव पाटवी पुत्र 
         रामसिंह जी के 
       है जो उनके प्रपोत्र अखेराज जी के नाम से
         अखेराजोत 
        कहलाते है , दुसरे पुत्र गोविन्द दास जी के वंशज
       गाँव ढ़ण्ढ़ोरा मे रहते है ,तिसरे पुत्र रायभान सिंह 
       जी के वंशज भटनोखा मे रहते है , चौथे पुत्र सुर 
       सिंह जी का गाँव बनडा है ओर गाँव को नहीं 
      बसाया ओर जोधपुर मे ही रहे इनकी हवेली है 
      जोधपुर मे जिसको बनड़ो की हवेली कहते है अभी  
      हवेली को हैरिटेज होटेल बना दिया है ऐसा सुना है  
      शेष 3 पुत्रो का इतिहास पता नहीं हुआ अभी तक 

     2. शंकर सिंह जी :- आपके वंशज बडला मे रहते है  
         ओर कुछ परिवार प्रताप सिंह जी का कोट तिंवरी 
        मे रहते हैं , लेकिन तिंवरी गाँव के जागीरदार 
        अखेराजोत ओर इनको बडला से लाकर यहाँ 
       बसाया गया है , ऐसा कहा जाता है 
        
       
     3. सोमत सिंह जी :- आपको दुदवड़ गाँव मिला हुआ
       था , लेकिन इनका इतिहास ओर वंशज कोई मिला 
       नहीं शायद इनके वंसज नहीं हुए  
       
     4-5 . सावंत सिंह ओर सुरताण सिंह जी :- इनके बारे  
     मे कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई ओर वंसज भी नहीं  
     है  
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         प्रताप सिंह जी के जागीर गाँव  
1. पितामाह दामा जी से इनको पारम्परिक गाँव तिंवरी
   मिला , जो कि राव जोधाजी ने दामा जी को दिया था 
  बाद मे मूलराज जी के बाद प्रताप सिंह जी को विरासत
   मे पिता द्वारा मिला था ,

2.3.4. बांकाली , मांडहाई , ओर गौंवा यह गाँव दामा जी  
           को मिले थे ओर बाद मे मूलराज जी के बाद प्रताप 
              सिंह जी को विरासत मे मिले  

पिता श्री मूलराज जी के कुछ गाँव प्रताप सिंह जी को
           विरासत मे मिले हुए थे ,निम्नलिखित गाँव 
    1. भैसेर कोटवाली .2.भैंसेर खुतडी . 3 ढ़ण्ढ़ोरा .
     4. तोडीय़ाणा . 5. भटनोखा 6. खेड़ापा 
      7. बाड़ा खुर्द , 8. मालूँगो .प्रमुख थे ओर भी हो
          सकते है  

         
          प्रताप सिंह जी को मिले हुए गाँव  
1. चेलावास , 2. धंवलासर .3 मोहवा  

   प्रताप सिंह जी के पास लगभग 16 गाँव थे , बाद मे सभी
    गाँव उनके पाटवी पुत्र  
   कल्याण सिंह जी के हूए , 
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 नानिहाल :- इनके पिता जी मूलराज जी ने तीन विवाह  
                 किये थे , 
                1. अजारी . 2. सांथु 3. उण 
           इनका नानिहाल गाँव नही लिखा है 
        वैसे तीनो गाँव ही नानिहाल है

Surat News पत्नी ने ही प्रेमी से मिल करवाई पति की हत्या

rajpurohiit news express
बारडोली.

महुवा के आंगलधरा में 8 जून की मध्यरात्रि वजनकांटा पर व्यापारी की 6 गोली मार कर हत्या मामले में पुलिस ने मृतक की पत्नी सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया। मृतक के बहन-बहनोई पर शक करने वाली पत्नी ने ही अपने प्रेमी से मिलकर पति की हत्या की सुपारी देने की हकीकत सामने आने पर ग्रामीण भी आश्चर्यचकित है। पुलिस ने इस मामले में एक आरोपी को वांछित घोषित किया है।



महुवा तहसील के आंगलधरा गांव स्थित मॉ कृपा वे-ब्रिज की कार्यालय में गांव के ही संजयसिंह दिलीपसिंह देसाई (32) की किसी अज्ञात लोगों ने 8 जून की मध्यरात्रि 6 गोली दाग कर हत्या कर दी थी। इस मामले में मृतक की पत्नी कृपा देसाई ने अज्ञात लोगों के खिलाफ महुवा पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में पत्नी ने संजयसिंह के बहन और बहनोई पर शक व्यक्त की थी। उसने शिकायत मे बताया कि दोनों बहन और बहनोई का संजयसिंह के साथ संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा है और कई बार विवाद भी हो चुका है। साथ ही एक बार तो बहनोई ने संजयसिंह को जान से मरने की धमकी भी दे दी थी। इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस कर रही थी लेकिन कोई कड़ी नहीं मिलने के बाद जांच सूरत जिला एलसीबी और एसओजी की टीम को सौंपी गई।



इस मामले में अलग-अलग दिशा में जांच के लिए पुलिस की कई टीमें बनाई गई। पत्नी की शंका के आधार पर पुलिस ने बहन-बहनोई और संजय के पिता दिलीपसिंह से पूछताछ की, लेकिन इस में भी कोई सुराग हाथ नहीं लगा। इस बीच पुलिस ने संजयसिंह के परिवार के साथ निकट के संबंध रखने वाले व्यक्तियों की पूछताछ और कॉल डिटेल की जांच की। वहीं आसपास के गेस्ट हाउस में भी तलाशी ली गई जिसमें हत्या के दो दिन पूर्व राजस्थान से आए दो व्यक्ति पास के उनाई गांव के महाकाली गेस्ट हाउस मे ठहरे होने की जानकारी पुलिस को मिली।



इसी दिशा में जांच कर रही पुलिस को पता चला कि संजयसिंह के घर में किरायेदार और उनकी ही जगह में किराने की दुकान चलाता कानसिंह उर्फ कांति दानसिंह राजपुरोहित मुल निवासी पादरु रोड बावतरा(32) का संजयसिंह की पत्नी कृपा के साथ अवैध संबंध थे। इस बात का पता चलने के बाद पुलिस ने इसी दिशा मेंं जांच शुरू की। इसमें मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल और अन्य टेक्निकल एनालिसिस के बाद हत्या कानसिंह उर्फ कान्ति ने ही कृपा के साथ मिलकर करवाई होने के पुख्ता सबूत मिले। पुलिस मामले की जांच कर ही रही थी तभी पुलिस को सूचना मिली कि हत्या कराने वाली कांति राजपुरोहित और श्रवण राजपुरोहीत और सुपारी लेने वाला हनुमान सिंह माधु सिंह राजपुरोहित (निवासी बालोतरा, बाड़मेर राजस्थान) बारडोली पलसाणा मार्ग पर वणेसा गांव के पास एकत्रित होकर सुपारी के रुपए की लेनदेन को लेकर बातचीत कर रहे हैं। इस पर पुलिस ने मौके पर पहुंच कर तीनों को हथियार के साथ गिरफ्तार कर लिया।



पुलिस पूछताछ में बदमाशों ने आंगलधरा निवासी संजयसिंह की हत्या करना स्वीकार किया। पुलिस ने तीनों के साथ संजयसिंह की पति कृपा को भी गिरफ्तार कर लिया। वहीं अन्य एक आरोपी पहादसिंह तेजसिंह राजपुरोहित (निवासी बालोतरा, बाड़मेर राजस्थान) को वांछित घोषित किया।


मृतक के घर में किराये पर रहता था आरोपी कानसिंह

गिरफ्तार आरोपी कानसिंह उर्फ कान्ति मृतक संजय सिंह के घर के प्रथम मंजिल पर पिछले आठ साल से किराए पर रहता था और उनके वजनकांटा के बाजू में ही किराना की दुकान चलाता था। कांति का संजय की पत्नी के साथ अवैध संबंध थे। दोनों बार-बार मिलते रहते थे और मोबाइल फोन पर भी बात करते रहते थे। दोनों के बीच के अवैध संबंध का संजयसिंह को पता चल गया था।



इस बात को लेकर संजयसिंह ने एक बार कांति को समझाया भी था। इसके बाद से कांति को शक था की संजयसिंह उसे मार देगा। इस बारे में उसने कृपा को भी बताया कि संजयसिंह उसे मार सकता रहै। इसके बाद दोनों ने तय किया कि अगर संजयसिंह नहीं रहेगा तो ही दोनों के साथ रह सकेंगे। इसके बाद कृपा और कांति ने संजयसिंह को रास्ते से हटाने का प्लान बनाया। 

संपत्ति को लेकर बहन-बहनोई से था विवाद

मृतक और बहन-बहनोई के बीच संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा था। वहीं बहन-बहनोई और संजयसिंह के बीच झगड़ा भी हुआ था। साथ ही एक बहनोई ने संजयसिंह को जान से मारने की धमकी भी दी थी। इस विवाद के बारे में रिश्तेदार और ग्रामीण भी जानते थे। ऐसे में संजयसिंह को मार कर हत्या का आरोप बहन बहनोई पर लगाने का प्लान बना दोनों ने हत्या की सुपारी देने का तय किया। 

इस तरह रची हत्या की साजिश

संजयसिंह की हत्या के लिए कांति ने अनावल में चांदनी रेडिमेड नामक दुकान चलाने वाले उसके दोस्त श्रवणसिंह बाबूसिंह राजपुरोहित से संपर्क किया। इसके बाद कांति ने श्रवण को कृपा से भी मिलवाया। तीनों ने मिलकर संजयसिंह की हत्या करने की साजिश रची और श्रवणसिंह को हत्या की सुपारी दी। श्रवण ने राजस्थान के बलोतरा निवासी उसकी बुआ के लडक़े हनुमानसिंह माधुसिंह राजपुरोहित से संपर्क किया, जो इससे पहले दो हत्या और एक हत्या के प्रयास मामले में फिलहाल जमानत पर है। उनके साथ 10 लाख रुपए में संजयसिंह की हत्या करना तय किया। इसमें से 5 लाख कान्ति देगा और 5 लाख संजयसिंह की बीमा पॉलिसी आने के बाद कृपा देगी ऐसा तय हुआ था।


हत्या से पहले सुपारी लेने वाले हनुमानसिंह राजपुरोहित ने अपने दोस्त पहाड़सिंह तेजसिंह राजपुरोहित के साथ मिलकर कार में कांति के साथ राजस्थान से आंगलधरा पहुंचे और संजयसिंह का घर, उनका वजन कांटा, वजनकांटा में कब उपस्थित रहता है इसकी बारीकी से जानकारी प्राप्त की। इसके बाद तीनों वापस राजस्थान चले गए। 4 जून को हनुमानसिंह और पहाड़सिंह पिस्टल के साथ कार से वापस आंगलधरा पहुंचे। वहां उनाइ के महाकाली गेस्ट हाउस में ठहरे। उनाइ से आंगलधरा आने के लिए अनावल निवासी श्रवणसिंह ने उसके लिए एक बाइक की भी व्यवस्था कराई थी। बाद में 8 जून की रात दोनों ने वजन कांटा पर मौजूद संजयसिंह पर 6 गोलियां दाग कर भाग निकले

हिंडौली की अनीता कवर पती कि हत्या का सदमा झेल कर भी हर परीक्षा पास करती गयी , अब आरएएस मे चयन ।

rajpurohiit news express
पति की हत्या हो, और स्वयं पांच माह की गर्भवती हो !
उस औरत के क्या अरमान शेष रहे होंगे ?
उपर से पारंपरिक रितीरिवाज से बंधे समाज की बहू ।
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हार नहीं मानी .. जीत की ठानी ... और पहाड़ सी मुसीबतों को तोड़ सफलता हासिल की कहानी रच दी ।
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नमन ऐसी संघर्षशील मातृशक्ति को 🙏🙏
ये हिंडौली की अनिता कंवर हैं। आरएएस में सलेक्शन हुआ है। आत्मविश्वास से लबरेज चेहरे पर दमकती ये मुस्कान और सफलता उनके सकारात्मक नजरिए की वजह से है, वरना तो जीवन साथी खो देने (वह भी हत्या) के दर्द से कोई भी महिला टूटकर बिखर जाती है। 

सिंदूर की कीमत और उसे खो देने का हक छिन जाने का मतलब क्या होता है, परम्परागत भारतीय परिवार की महिला से ज्यादा भला कौन जान सकता है। बिखरने की बजाए दर्द को समेटकर अनिता कंवर ने परंपराओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़ने का रास्ता तलाशा। अनिता की कहानी उन महिलाओं को जाननी चाहिए, जिन्होंने पति को खोने के बाद खुद को भुला बैठी हैं... उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी। 

सीख- सकारात्मक नजरिए से हर मुश्किल हो जाती है आसान 

किसी के जाने से जिंदगी खत्म नहीं होती, आगे भी बहुत कुछ है... 

‘जनवरी 2013 को मैंने पति को खो दिया, तब शादी को महज 6 साल हुए थे। दूसरी बिटिया तब पेट में थी। पति को खोने का दर्द बताने के लिए शब्द छोटे पड़ जाते हैं, पर मैंने झेला। बिटिया को जन्म दिया, एक बिटिया पहले से थी। मैंने खुद को और परिवार को संभाला। दोनों बिटिया गोरांशी, वृतिका को संभाला। उन्हें पिता का भी प्यार दिया। ऐसे हादसे में औरत का आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता है, हीन भावना अा जाती है। दर्द के भंवर और निगेटिविटी से खुद को मैंने आहिस्ता-आहिस्ता बाहर निकाला। यही सोचकर कि जो होना था-हो चुका, जिंदगी यहीं पर खत्म नहीं हो जाती, इससे आगे भी अपॉर्च्युनिटी है। निगेटिविटी दिमाग से झटक दी। सोच लिया आगे बढ़ना ही है। फिर मैंने जो भी लक्ष्य तय किया, वो हासिल करती गई। थर्ड ग्रेड, सैकंड ग्रेड टीचर, लेक्चरर, आरएएस में भी दो बार सलेक्ट हो चुकी।’ 

जमीन के विवाद को लेकर पति की हत्या हुई थी: अनिता कंवर के पति राजेंद्रसिंह आशावत भाजयुमो के हिंडौली मंडल अध्यक्ष थे, जमीन के विवाद को लेकर जनवरी-2013 में उनकी हत्या कर दी गई। तब अनिता पांच माह की गर्भवती थी। 

सफलता भरा कैरियर, हर परीक्षा में हुई पास: अनिता कंवर हर परीक्षा में पास हुई। जनवरी 2013 में पति को खोया। अक्टूबर में थर्ड ग्रेड टीचर बनी, आरएएस-2013 का एग्जाम दिया। दिसंबर 2014 में सैकंड ग्रेड (मैथ्स) टीचर सलेक्ट हुई। अक्टूबर 2016 में स्कूल लेक्चरर में सलेक्शन हो गया। आरएएस-2013 का रिजल्ट आ गया, उसमें भी सलेक्ट हो गई, पर दोनों बेटियों के लिए स्कूल लेक्चरर का जॉब चुना, आरएएस-2016 का एग्जाम दिया। फिर 2018 में आरएएस मेन्स दिया, रिजल्ट आना है। इसी महीने आरएएस-2016 का रिजल्ट आ गया और वे सलेक्ट हो गई। वे टोंक में तहसीलदार सेवा की ट्रेनिंग कर रही हैं। आरएएस-2018 का रिजल्ट आना बाकी है, जो सबसे अच्छा गया है। उन्हें इसमें सलेक्शन की पूरी उम्मीद है, तब वे तहसीलदार सेवा की बजाए उसे चुनेंगी।

आत्महत्या का हब बनता बाड़मेर*

*आत्महत्या का हब बनता बाड़मेर*

एक जमाने मे #सीमांत_मरुस्थल और यहां के लोग विकट परिस्थितियों में कुदरत को पराजित करके और विज्ञान को चुनोती देकर भी जीवनयापन कर लेते थे पर समय के साथ साथ यहां सुविधाएं और सौगाते बढ़ी और साथ ही कई दुविधाएं भी...!
कभी कर्मण्यता व जीवनसंघर्ष का प्रतीक रहा #थार, आज रिश्तों मे बढती कड़वाहट, खत्म होते रिश्ते, अवैध सम्बन्धों, प्रेम प्रसंगों, कर्ज की चिंता,
आजीविका के अभाव, नफरत, द्वेष, ईर्ष्या व मानसिक तनाव जैसे कारणों की वजह से आत्महत्या के मामलों में सम्पूर्ण देश मे नम्बर 01 के पायदान पर है।

यहां के लोग हर परिस्थिति मे आत्महत्या को ही अतिम विकल्प मानने लगे है और
यही वजह हैं कि थार मे पिछले कुछ वर्षों से आत्महत्या के मामले लगातार बढते जा रहे है।
पिछले चार साल के आकडों पर नजर डालें तो थार में हर 48 घंटे बाद एक शख्स ने खुदकुशी करके दुनिया को अलविदा कहा है।

बदलते वक्त और बढ़ती आधुनिकता ने में सब कुछ बदल रहा है और इस बदलाव ने ना सिर्फ जिले की चाल बदली है बल्कि दिशा व दशा भी बदल दी है।

कल तक जीवन संघर्ष का पर्याय रही थार नगरी बाड़मेर आज अवसाद का पर्याय बन गई हैं,
कल तक जहां जिदंगी सघर्ष कर रही थी और रणबांकुरे मूँछो पर तांव देकर मौत के साथ कबड्डी खेला करते थे आज वहाँ मौत जिन्दगी को आंखे दिखा रही है।

निराशा और हताशा का आलम ये है कि बाड़मेर ज़िला पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक़ 2015 में 139 मामले, 2016 में 134 मामले और 2017 में 125 मामले  खुदकशी के सामने आए है जबकि 2018 में भी ये आँकड़े कम होने की बजाय बढ़े है।

2015 से 2018 तक करीब 550 से अधिक लोग खुदकुशी द्वारा मौत को गले लगा चुके हैं और ये सरकारी ऑफ्फिसियल आंकड़े है कुल संख्या इससे भी कही अधिक होगी।

एक पूरा जीवन जो इस धरा पर आने में सतरंगे सपनों से लेकर नौ माह का खूबसूरत समय लेता है, अचानक अपनों को रोता-बिलखता छोड़कर चल देता है अज्ञात में सुख खोजने।
क्या जरूरी है कि मौत के बाद सारी समस्याएँ सुलझ जाएँगी...?
असमय प्रकृति का नियम तोड़ने से हो सकता है आप और अधिक अनजानी अजीब समस्याओं के जाल में उलझ जाएँ।
बहरहाल, आत्महत्याओं के बढ़ते आँकड़ों से निकलती आह को अनसुना नहीं किया जा सकता।

*क्या_है_वजह :*
खतरनाक रूप से बढ़ रही इस नकारात्मकता ने अचानक सबको चिंता में डाल दिया है।
आखिर क्यों बढ़ रही है खुद को खत्म करने की यह खौफनाक प्रवृत्ति...?
यूँ तो गरीबी अपने आप में एक अहम वजह है परेशानी और पीड़ा की लेकिन बाड़मेर जैसे जिले में गरीबी की वजह से आत्महत्या को जायज नही ठहराया जा सकता है।

*सहनशक्ति_का_अभाव*
भारतीय मानस पहले इतना कमजोर कभी नहीं था जितना अब दिखाई पड़ रहा है।
कम सुविधा व सीमित संसाधन में भी संतोष और सुख से रहने का गुण इस देश की संस्कृति में शुरू से रचा-बसा है,
जिसका सबसे बड़ा आधार हमारी आध्यात्मिकता रही है।
आम भारतीय ईश्वर में दृढ़ विश्वास कर हर परिस्थिति में हिम्मत और धैर्य रखता आया है लेकिन जैसे-जैसे 'लक्जरी' ने जरूरतों का रूप धारण आरंभ किया है, आधुनिकता, आर्थिक उदारीकरण और टेक्नोलॉजी ने चारों दिशाओं में पंख पसारे हैं वैसे-वैसे तेजी से एक साथ सब कुछ हासिल करने की लालसा से जीवनशैली में भी तीव्रतर बदलाव हुए है और इंसान लगातार ईश्वर व आध्यात्मिकता से दूर होता जा रहा है।
जिसकी वजह से जीवन स्तर की असमानता और मानसिक तनाव व्यक्तित्व को लगातार कुंठित बना रही है।
समय के साथ साथ सहनशक्ति और समझदारी विलुप्त हो रही है।

*सामाजिक_पारिवारिक_संरचना_ध्वस्त_होना*
बदलते दौर में टीवी-मोबाईल, सोशल मीडिया की डिजिटल संस्कृति ने परस्पर संवाद को कमतर किया है।
परिणाम-स्वरूप माता-पिता के पास बच्चों से बात करने का समय नहीं बचा है। यह स्थिति दोनों तरफ है, आज का किशोर और युवा भी व्यस्तता से त्रस्त है। कंप्यूटर-टीवी ने खेल संस्कृति को डसा है।
आउटडोर गेम्स के नाम पर बस क्रिकेट बचा है।
टीम भावना विकसित करने वाले, शरीर में स्फूर्ति प्रदान करने वाले और खुशी-उत्साह बढ़ाने वाले खेल अब विलुप्त हो रहे हैं।
प्राइवेसी को आवश्यकता से अधिक बढ़ावा मिला है जिसके तहत आस पड़ोस और संवाद पिछड़ गया है।
यही वजह है कि ना बाहरी रिश्तों में सुकून है ना घर के रिश्तों में शांति।
दोस्ती व संबंधों का सुगठित ताना-बाना अब उलझता नजर आ रहा है।
नानी-दादी की कहानियाँ और संयुक्त परिवार व्यवस्था तो त्रेता या द्वापर में ही पीछे छूट गयी है।
कल तक जो संबल और सहारा हुआ करते थे आज वे बोझ और बेमानी लगने लगे हैं।

*टूटते_रिश्ते*
रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट के कारण आज के दौर में रिश्ते कच्चे धागों की तरह टूटते जा रहे है, आपसी अनबन, मनमुटाव, नोक झोंक, मिस अंडर स्टैंडिंग और संवेदनशीलता के अभाव में आये दिन रिश्ते काच की तरह टूटते जा रहे जिससे मानसिक अवसाद व आत्महत्या को बढ़ावा मिल रहा है।

*प्रेम_प्रसंग_व_अवैध_सम्बन्ध*
आज आत्महत्या के अधिकतर मामलों की जड़ में प्रेम प्रसंग व अवैध सम्बन्ध है।
बढ़ती चकाचौंध, आधुनिकता, पश्चिम सँस्कृति का बढ़ता प्रभाव, बॉलीवुड व रील लाइफ ने रियल लाइफ को अपनी ओर आकर्षित किया है,जिसकी वजह से युवा प्रेमजाल में धसते जा रहे है और जब प्रेम प्रसंग में असफलता हाथ लगती है या बात जाति बिरादरी व धर्म सम्प्रदाय पर आकर रुक जाती है तो ऐसे में खुदकुशी को अंतिम विकल्प मान लिया जाता है।
आत्महत्या के बढ़ते ग्राफ में अवैध सम्बन्ध भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा है।

*बिखरता_युवा_वर्ग*
देश की युवा शक्ति आज के हाँफते-भागते दौर में अस्त-व्यस्त-त्रस्त है या फिर अपनी ही दुनिया में मस्त है।
आत्मकेन्द्रित युवा अपने सिवा किसी को देख ही नहीं रहा है।
जब उसे पता ही नहीं है कि दुनिया में उससे अधिक दुखी और लाचार भी हैं तब वह अपने दुख-तकलीफों को ही बहुत बड़ा मान लेता है।
घर आने पर कोई उससे यह पूछने वाला नहीं है कि उसके भीतर क्या चल रहा है। हर कोई टीवी के कार्यक्रमों के अनुसार अपनी दिनचर्या निर्धारित करने में लगा है। किसे फुरसत अपने ही आसपास टूटते-बिखरते अपने ही घर के युवाओं को जानने-समझने की...?
उनकी भावनात्मक जरूरतों और वैचारिक दिशाओं की जाँच-पड़ताल करने की..?
एक दिन जब वह आत्मघाती कदम उठा लेता है तब पता चलता है कि ऊपर से शां‍त और समझदार दिखने वाला युवा भीतर कितना आँधी-तूफान लिए जी रहा था।
वास्तव में माता-पिता को समय के साथ बदलना होगा,कब तक सारी की सारी अपेक्षाएँ संतान से ही की जाती रहेगी...?
ढेर सारे सामाजिक दबाव, सारी जिम्मेदारियाँ उसी की क्यों...?
सारे समझौते वही क्यों करें ? दबाव की इस स्थिति को माँ-बाप, निकट रिश्तेदार और मित्र ही कुशलता से निपटा सकते हैं, अगर वे चाहें।
शर्त ये है उन्हें उसकी मनोदशा को समझना होगा और उसके कन्धे पर हाथ रखकर उसका हौसला बढाये, उसे प्रेरणा दे और तनाव से उबरने में उसकी सहायता करें।

*समाधान_हमारे_भीतर_ही_है*
जी हाँ, समाधान कहीं और से नहीं हमारे ही भीतर से आएगा,खुद को खत्म कर देने की बात जब आती है तो दूसरों को दोष देने में थोड़ा संकोच होता है।
वास्तव में हम स्वयं ही हमारे लिए जिम्मेदार होते हैं।
कोई भी दुख या तकलीफ जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती।
हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा दौर आता है जब सबकुछ समाप्त सा लगने लगता हैं लेकिन इसका सार यह तो नहीं कि खुद ही खत्म हो जाएँ।

हर आत्महत्या करने वाले को एक बार, सिर्फ एक बार यह सोचना चाहिए कि क्या उसकी जिंदगी सिर्फ उसकी है...?
इस जिंदगी पर कितने लोगों का कितना-कितना हक है, क्या उसे पता है..?
क्या वह जानता है कि उसकी मौत के बाद उसका परिवार, दोस्त, रिश्तेदार, करीबी लोग कितनी-कितनी मौत मरेंगे....?
हमें कोई हक नहीं उस जिंदगी को समाप्त करने का जिस पर इतने सारे लोगों का अधिकार है।
जब रोशनी की एक महीन लकीर अंधेरे को चीर सकती है, जब एक तिनका डूबते का सहारा बन सकता है और एक आशा भरी मुस्कान निराशा के दलदल से बाहर ला सकती है तो फिर भला मौत को वक्त से पहले क्यों बुलाया जाए...?
जिंदगी परीक्षा लेती है तो उसे लेने दीजिए, हौसलों से आप हर बाजी जीतने का दम रखते हैं, यह विश्वास हर मन में होना चाहिए और फिर हमारे तो शास्त्रों में कहा गया है कि इंसान का जन्म 84 करोड़ योनियों के बाद नसीब होता है तो इसे क्यों ऐसे ही व्यर्थ गंवाया जाए...?

जिले को इस तरह के भयावह आकडों से बाहर निकालने की, थार के युवाओं को उचित मार्गदर्शन की व समय पर चेतने की शख्त आवश्यकता है अन्यथा वह दिन दूर नही जब थार की युवा पीढ़ी का जीवन भी थार की भांति बंजर और वीरान बनकर रह जायेगा....!