दिल्ली में गुरुदेव श्री तुलसारामजी महाराज का भव्य स्वागत, शोभायात्रा और भजन संध्या में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
नई दिल्ली। ब्रह्म सावित्री सिद्ध पीठाधीश्वर परम पूज्य गुरुदेव श्री श्री 1008 श्री तुलसारामजी महाराज के दिल्ली आगमन पर राजपुरोहित समाज दिल्ली-एनसीआर ने श्रद्धा और उल्लास के साथ भव्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किया। गुरुदेव वृंदावन में भगवान श्री बांके बिहारीजी के श्रीचरणों और मां यमुना के पावन तट पर चातुर्मास की तप-साधना पूर्ण करने के बाद 4 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पहुंचे। उनके स्वागत में निकली शोभायात्रा, भजन संध्या, आशीर्वचन और प्रसादी ने कार्यक्रम को समाज की आस्था तथा एकता का विशेष अवसर बना दिया।
गुरुदेव के आगमन पर आकर्षक रूप से सजाई गई बग्गी में उन्हें विराजमान कर शोभायात्रा निकाली गई। यात्रा में पुरुषों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों सहित बड़ी संख्या में समाजबंधुओं एवं श्रद्धालुओं ने भाग लिया। मार्ग में गुरुदेव के जयकारे गूंजते रहे और श्रद्धालुओं ने उनके दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। गुरुदेव के साथ आए भक्तों का भी सम्मानपूर्वक स्वागत किया गया। धार्मिक वातावरण में निकली यह शोभायात्रा दिल्ली-एनसीआर में बसे राजपुरोहित परिवारों के लिए अपनी गुरु परंपरा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का भावपूर्ण माध्यम बनी।
शोभायात्रा के बाद आयोजित भजन संध्या में भक्ति के स्वर देर तक गूंजते रहे। भजन कलाकार चुन्नीलाल राजपुरोहित ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रद्धालुओं को भक्तिरस में सराबोर किया। सामूहिक भजन, गुरु वंदना और जयकारों के बीच उपस्थित समाजबंधु भाव-विभोर दिखाई दिए। कार्यक्रम का मंच संचालन चंदन सिंह ने किया। आयोजन के समापन पर प्रसादी की व्यवस्था भी रखी गई, जिसमें समाजबंधुओं और श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
गुरुदेव श्री तुलसारामजी महाराज ने अपने आशीर्वचन में माता-पिता की सेवा को जीवन का प्रमुख धर्म बताया। उन्होंने कहा कि माता-पिता संतान को जन्म देने के साथ संस्कार, शिक्षा और जीवन की दिशा देते हैं, इसलिए उनकी तन-मन से सेवा और आज्ञा का पालन प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए। गुरुदेव ने समाजबंधुओं को सत्य के मार्ग पर चलने, अच्छे कर्म करने और बुरे व्यसनों से दूर रहने का संदेश भी दिया। उनके आशीर्वचनों में परिवार, संस्कार, सदाचार और सामाजिक जिम्मेदारी को जीवन में उतारने पर विशेष जोर रहा।
कार्यक्रम में राजपुरोहित समाज दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधि और समाजबंधु उपस्थित रहे। इनमें कान सिंह गुरलाई, श्रवण सिंह नारवा, जोरावर सिंह कनोडिया, सोहन सिंह पुरोहितासनी, पहलाद सिंह मादड़ी, जबर सिंह भासूदा, पवन सिंह ढाबर, बाबू सिंह सरवड़ी, बलवंत सिंह सिद्धमुख, गोविंद सिंह निम्बाड़ा, डूंगर सिंह अराबा, भेरू सिंह सराना, भैरू सिंह लूम्बावास, दीपक भीनमाल, जोग सिंह आलासन, नरपत सिंह आलासन, रतन सिंह खुड़ी, गोरधन सिंह लेड़ी, स्वरूप सिंह चावंडा और भंवर सिंह नारवा सहित अनेक श्रद्धालु शामिल हुए।
दिल्ली-एनसीआर में बड़ी संख्या में राजपुरोहित परिवार निवास करते हैं। अपने मूल गांवों और राजस्थान से दूर रहते हुए भी ऐसे धार्मिक आयोजन उन्हें गुरु परंपरा, संस्कार और समाज की सामूहिक पहचान से जोड़े रखते हैं। एक ही मंच पर वरिष्ठों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों की भागीदारी समाज में पीढ़ियों के बीच संवाद बढ़ाती है। धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को सेवा, अनुशासन, माता-पिता के सम्मान तथा व्यसनमुक्त जीवन का संदेश मिलने से आयोजन का सामाजिक महत्व भी बढ़ जाता है।
वृंदावन चातुर्मास के बाद गुरुदेव का दिल्ली आगमन भक्तों के लिए विशेष रहा। चातुर्मास साधना, संयम, सत्संग और आत्मचिंतन की परंपरा से जुड़ा काल है। इस तप-साधना के पश्चात गुरुदेव के दर्शन और मार्गदर्शन का अवसर मिलने पर समाजबंधुओं ने प्रसन्नता व्यक्त की। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरुदेव द्वारा बताए सेवा, प्रेम, सदाचार और परस्पर सहयोग के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
यह आयोजन केवल स्वागत समारोह नहीं रहा, बल्कि राजपुरोहित समाज की गुरु भक्ति और संगठन शक्ति का जीवंत उदाहरण बना। दिल्ली जैसे महानगर में समाजबंधुओं का एकत्र होना यह दर्शाता है कि भौगोलिक दूरी के बावजूद गुरु परंपरा और सामाजिक रिश्ते मजबूत हैं। आयोजन के माध्यम से परिवारों ने एक-दूसरे से संपर्क बढ़ाया और समाज में प्रेम, संस्कार, सेवा तथा आपसी सहयोग की भावना को आगे बढ़ाने का संदेश दिया।
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