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राजपुरोहित प्रतापसिंह जी मूलराजोत सेवड तिंवरी
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परिचय :- प्रताप सिंह जी का जन्म विक्रमी संवत १५५५ कार्तिक मास की पूर्णिमा यानी देव दीपावली को जोधपुर के राजपुरोहित मूलराज जी घर हुआ था! मूलराज जी राव गांगा जी के राजपुरोहित थे ! मूलराज जी दो दर्जन से ज्यादा गांवों के जागीरदार थे ! प्रताप सिंह जी अपने आठ भाइयों मैं सबसे बड़े थे और जोधपुर के राजा मालदेव जी के राजपुरोहित बने थे विक्रम संवत 15 88 में मूलराज जी की हत्या के बाद बने !
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भाई :- प्रताप सिंह जी के बड़े पिताजी भोजराज सिंह जी तालकिया और केसुसिंह जी घंटियाला थे , भाई राज सिंह जी विकरलाई , महेश दास जी चाडवास , छता जी धुरासनी , रायसल जी मालपुरिया , भानीदास जी भोजास , रायमल जी , विरम देव जी दोनों शहीद हुए और इनके वंशज नहीं हुए ! प्रताप सिंह जी सबसे बड़े पुत्र थे इसलिए वे तिंवरी में ही रहे और सभी छोटे भाई तिंवरी से बाहर निकल कर सभी ने अपने अपने गांव बसाए यह सभी गांव मूलराज जी को मिले हुए थे
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पद :- प्रताप सिंह जी राव माल देव जी के राजपुरोहित बने यह पहला अवसर था जब राजा और राजपुरोहत एक साथ एक समय में पद ग्रहण किए क्यू कि राव माल देव जी ने अपने पिता का तख्ता पलट कर दिया और राजा बने थे और मूलराज जी राव गांगा की रक्षा करते हुए किले में शहीद हुए मालदेव जी की सैनिक टुकड़ी के हाथो १५८८ विक्रम संवत में , इस घटना से मालदेव जी दुःखी हुए कि मेरे सैनिकों ने मूलराज जी को मार डाला , तब वे प्रताप जी से माफ़ी मांगी थी उस समय उनकी उम्र केवल २० साल थी और प्रताप जी ३३ साल के थे और साथ साथ ही रहते थे चाहे युद्ध में या किले में जिगरी दोस्त की तरह सभी युद्धो में
भाग लिया और एक बार माल देव जी के साथ आखेट पर भी उनके साथ गए थे तब एक शेर ने अचानक माल देव जी पर हमला किया और उनको दबोच लिया तभी प्रताप जी ने एक वार में भाला आर पार कर शेर को मार डाला और राव जी को बचा लिया था , यह बात कैसरी सिंह जी के जसप्रकास नामक किताब में लिखा हुआ है
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राव मालदेव जी :- का जन्म वि॰सं॰ 1568 पोष बदि 1 को (ई.स. 1511 दिसम्बर ५) हुआ था। पिता की मृत्यु के पश्चात् वि॰सं॰ 1588 (ई.स. 1531) में सोजत में मारवाड़ की गद्दी पर बैठे। उस समय इनका शासन केवल सोजत और जोधपुर के परगनों पर ही था। जैतारण, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, खेड़, महेवा, सिवाणा, मेड़ता आदि के सरदार आवश्कतानुसार जोधपुर नरेश को केवल सैनिक सहायता दिया करते थे। परन्तु अन्य सब प्रकार से वे अपने-अपने अधिकृत प्रदेशों के स्वतन्त्र शासक थे। मारवाड़ के इतिहास में राव मालदेव का राज्यकाल मारवाड़ का "शौर्य युग" कहलाता है। राव मालदेव अपने युग का महान् योद्धा, महान् विजेता और विशाल साम्राज्य का स्वामी था। उसने अपने बाहुबल से एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। मालदेव ने सिवाणा जैतमालोत राठौड़ों से, चौहटन, पारकर और खाबड़ परमारों से, रायपुर और भाद्राजूण सीधलों से, जालौर बिहारी पठानों से, मालानी महेचों से, मेड़ता वीरमदेव से, नागौर, सॉभर, डीडवाना मुसलमानों से, अजमेर साँचोर चौहाणों से छीन कर जोधपुर-मारवाड़ राज्य में मिलाया। इस प्रकार राव मालदेव ने वि॰सं॰ 1600 तक अपने साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार कर लिया। उत्तर में बीकानेर व हिसार, पूर्व में बयाना व धौलपुर तक एवं दक्षिण-पश्चिम में राघनपुर व खाबड़ तक उसकी राज्य सीमा पहुँच गई थी। पश्चिम में भाटियों के प्रदेश (जैसलमेर) को उसकी सीमाएँ छू रही थी। इतना विशाल साम्राज्य न तो राव मालदेव से पूर्व और न ही उसके बाद ही किसी राजपूत शासक ने स्थापित किया।
तो इस तरह उन्होंने अपने कुटुंबी भाइयों और रिश्तेदारों के राज्य छीन लिए अपने बाहुबल और विस्तारवादी नीति के तहत और वे कभी किसी पर दया नहीं करते थे वे बहुत हठीले और जिद्दी स्वभाव के थे
किसी की नहीं सुनते थे इसलिए वे हारे हुए सभी राजा उनसे बदला लेने के लिए दिल्ली चले गए शेरशाह सूरी को सब हालात बताए और कहा अब आपकी बारी भी आ सकती हैं इससे पहले आप हमारा साथ दें तो उनको हराकर हम अपने राज्य वापस हासिल कर सकते है और आपके साथ सन्धि रहेंगी आप जो चाहें शर्त रखो तब सुरी राजी हुआ और अपनी सेना लेकर आया उस सेना में शामिल सभी वे राजा थे जिनको माल देव जी ने बे घर किया था इनमें से प्रमुख मेड़ता और बीकानेर के राजा थे
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सुमेल - गिरी का युद्ध :- राव माल देव जी और शेरशाह सूरी के बीच पाली जिले की सीमा पर सुमेल और गिरी स्थान पर विक्रम संवत १६०० में हुआ दोनों गांवों के बीच दूरी ५-१० किमी है जो कि रास बाबरा जैतारण के पास है और ब्यावर के काफी नजदीक है , और सुरी के साथ राजपुत भी बहुत थे एक तरह से गठबंधन सेना थी और मालदेव जी के साथ कोई राजा नहीं थे फिर भी जोधपुर की सेना ने शुरुवाती दिनों में सूरी की सेना को पछाड़ दिया और १-२ दिन में ही ३५००० सैनिकों को मार डाला खुद के १२०००-१५००० के करीब सैनिकों को खोना पड़ा लेकिन शेरशाह सूरी बहुत डर गया कि वो सभी राजपूत राजाओं को कहने लगा की आप सभी ने मुझे यहां मुठ्ठी भर बाजरे के लिए इतना बड़ा नुकसान करा दिया कुछ दिन अगर ऐसा ही चला तो मै दिल्ली को संभालने के लायक भी नहीं रहूंगा तभी एक करीब १५००० फौज लेकर एक मुस्लिम सहयोगी दल आने की खबर मिलते ही वो रुक गया लेकिन वो सेना २ दिन बाद यहां पहुंचेगी तब तक कोई दूसरा रास्ता निकलने को कहा तब वहां मौजूदा राजपुत राजाओं ने कहा कि आप एक चाल चलो कि यह खबर फैला दो की आपने जैता और कुंपा को अपनी ओर मिला लिया है और वे कल बगावत कर लेंगे और नकली दस्तावेज उनके सिविर में फेंका दिया और एक पत्र माल देव जी के पास भी भेज दिया कि हमने आपके सेनापति जेता ओर कूंपा को अपनी ओर मिला लिया है यह खबर पता चली तो उन्होंने जांच करवाई गई तो जांच में एक तलवार में पत्र मिला ओर उनको सच मानकर माल देव जी बीच युद्ध में से ही रात को अपने ५ हजार सैनिकों के साथ जोधपुर चले जाते है वहां से आगे सिवाना चले जाते है लेकिन वे अपने साथ प्रताप सिंह जी को नहीं लेकर गए थे , उन्होंने पीछे जो सेना बची थी उसका सेनापति नियुक्त करके चले जाते है जिसको विश्वासी सेना कहते हैं ओर वो सेना सिर्फ सुमेल में लड़ी थी , ओर जेता , कुम्पा राठौर को पता चला तो बहुत नाराज़ होकर गिरी स्थान पर मोर्चा बना कर अपने ऊपर लगे गद्दारी का झूठा आरोप कि वजह से ज्यादा गुस्से में थे उन्होंने कहा हम गद्दार नहीं है और हम सब यही लड़कर प्राण त्याग देंगे पर सूरी को आगे नहीं बढ़ने देंगे उनके पास ६००० सैनिक थे ओर प्रताप सिंह जी के पास केवल १५०० सैनिक ही थे लेकिन बहुत दिनों तक सीमा पर लड़ते रहे लेकिन रोज रोज कुछ सैनिक शहीद हो ते गए
ओर सूरी के पास ज्यादा समय नहीं था व फोज बहुत बड़ी थी तो वो आखिर जीत दर्ज करने में सफल रहा वहा पर लड़ते हुए सभी सैनिक शहीद हो मारवाड़ के प्रताप जी भी ओर जेता कूंपा राठौर भी कोई नहीं बचा था
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सिंह की उपाधि :- जब राव माल देव को पता चला कि सभी बड़े बड़े योद्धा शहीद हो गए है तो वे बहुत निराश हो गए थे , लेकिन प्रताप जी को सिंह का खिताब देकर उनको सम्मान देते है मित्रो इतिहास में तो जेता व कूंपा जी राठौर के बारे में बहुत बड़े शूरवीर थे ऐसा लिखते है , लेकिन प्रताप सिंह जी का नाम भी शामिल नहीं करने वाले इतिहासकारों को सोचना चाहिए कि आखिर राव मालदेव जी ने सिंह की उपाधि पुरोहित प्रताप जी को ही क्यों प्रदान की कुछ तो काबीलियत रही होगी लेकिन कुछ आधुनिक राजपूती विचारधारा के लेखक उनका नाम तक लिखना नहीं चाहते हैं सिर्फ राजपूती आन बान शान बचाने के लिए यह रास्ता ठीक नहीं है ,
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प्रताप सिंह जी के दोहे -
सिंह तणी पदवी सुमेल , रण दी मालो राव !
सिंह प्रोहित प्रताप सिंह , रण उबरिया राव !!
अर्थात :- सिंह की पदवी सुमेल के युद्ध में राव माल देव जी ने दी
व प्रताप सिंह जी की तुलना शेर से की ओर राव माल देव को युद्ध में बचाया है
राजपुरोहित दूल्हों पातलो , संभालो रण सुमेल !
जेता कुम्पा जोरा रा , झुरी अप्सरा झेल !!
अर्थात :- राजपुरोहित प्रताप जी आप ही अब इस बारात फोज के दूल्हे
हो अब आप ही इस युद्ध भूमि सुमेल को संभालो
जेता कूंपा राठौर भी जोर थे ओर तीनों शूरवीरों को शहीद होने के बाद स्वर्ग की अप्सराए उन्हें लेने के नीचे झुक कर स्वर्ग में लेकर गई हैं
मुझे इस दोहे का अर्थ कही लिखा नहीं मिला है मैने मेरे अंदाज से लिखा है जो लगभग सही कह सकते हैं
यह दो दोहे ही काफी है कि प्रताप सिंह जी क्या थे लेकिन लिखने वाले इनका नाम नहीं लिखते उनके मुंह पर जोरदार तमाचा है
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प्रताप सिंह जी खुद को मिले गांवो की सुची
1. चेलावास :- यह गाँव पाली जिले मे है इस गाँव की सालाना
आमदनी 20001 फदिया थी , यह गाँव विक्रम संवत
1588 माघ वदी 12 को राव मालदेव जी ने दिया था
इस गाँव के ताम्रपत्र की नकल मेरे पास है इस गाँव
को प्रताप सिंह जी के वंशजो ने अपना ठिकाना नहीं
बनाया वहां कोई निवास करने नहीं गये क्यूकी प्रताप
सिंह जी के पास लगभग 15 गाँव थे , इसिलिए सभी
गाँव नहीं बसा पाये थे ओर
बाद मे कुछ पीढ़ी बाद निरस्त कर दिये जाते थे
2. धंवलासर :- यह गाँव जोधपुर जिले मे है इस गाँव को राव
मालदेव जी के ज्येष्ठ पुत्र उदय सिंह जी ने विक्रमी
संवत 1616 जेठ वदी 11 के दिन दिया था प्रताप जी
मरणोपरांत उनकी वीरता से प्रभावित होकर दिया था इस गाँव मे भी कोई रहने नहीं गये , इस गाँव के ताम्र पत्र की नकल मेरे पास है
3. मोहवा :- यह गाँव मालदेव जी के पुत्र राव चन्द्रसेन जी ने दिया
था यह गाँव नीवसींव सुधा अर्थात जिस समय गाँव
दिया गया उस समय उसकी जो सीमाये थी उसके
अनुसार दिया गया था , यह गाँव सभी देदवतो ओर
दामावतो को साझा दिया था , परवाने मे निवेवगी तथा
अघाट { सम्पूर्ण आय इनको मिलेगी } इस गाँव की
आय 13000 फदिया सालाना थी , इस को एक अन्य
गाँव इनके पुर्वजो का गाँव काबाला था ज़िसको रद्द
करके यह गाँव काबाला के बदले मे दिया गया है
काबाला गाँव की सालाना आय 20000 फदिया थी
यह गाँव राव चन्द्र सेन जी ने विक्रमी संवत 1620 मे
वैसाख वदी 9 को प्रतापसिंह जी को मरणोपरांत
दिया गया था , इस गाँव को भी नही बसाया गया
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पुत्र :- प्रताप सिंह जी के 5 पुत्र थे , लेकिन
सबके नाम
स्पष्ट मालुम नहीं हूए क्युकी 3पुत्रो के
वंशज नहीं
है ओर तीनो पुत्रो का इतिहास भी नहीं
मिला इनके
बारे में कही कोई जानकारी प्राप्त नहीं
हुई
1. ठाकुर कल्याण सिंह जी :- आप सभी
भाइयो मे
बड़े थे ओर पाटवी पुत्र होने के कारण
तिंवरी
मे रहे ओर राव मालदेव जी ने आपको
ठाकुर की
पदवी ओर समस्त राजपुरोहितो मे पाटवी
पद दिया
जिसका मतलब होता था कि समस्त
राजपुरोहितो मे
सबसे पहले आपकी बात सुनी जायेगी
य़ानी एक
मुखिया की तरह , ओर आप जोधपुर
रियासत के
राजपुरोहित पद पर रहे मालदेव जी ओर
राव
चन्द्रसेंन जी के समय आप विक्रम .संवत
1632 मे
चन्द्रसेंन जी
की जगह राजा बनकर सिवाना के
पीपलाणा गाँव के
पहाडी पर शहीद हूए , इनके सात पुत्र थे
ओर आज 11
गाँवो मे रहते है , 8 गाँव पाटवी पुत्र
रामसिंह जी के
है जो उनके प्रपोत्र अखेराज जी के नाम से
अखेराजोत
कहलाते है , दुसरे पुत्र गोविन्द दास जी के वंशज
गाँव ढ़ण्ढ़ोरा मे रहते है ,तिसरे पुत्र रायभान सिंह
जी के वंशज भटनोखा मे रहते है , चौथे पुत्र सुर
सिंह जी का गाँव बनडा है ओर गाँव को नहीं
बसाया ओर जोधपुर मे ही रहे इनकी हवेली है
जोधपुर मे जिसको बनड़ो की हवेली कहते है अभी
हवेली को हैरिटेज होटेल बना दिया है ऐसा सुना है
शेष 3 पुत्रो का इतिहास पता नहीं हुआ अभी तक
2. शंकर सिंह जी :- आपके वंशज बडला मे रहते है
ओर कुछ परिवार प्रताप सिंह जी का कोट तिंवरी
मे रहते हैं , लेकिन तिंवरी गाँव के जागीरदार
अखेराजोत ओर इनको बडला से लाकर यहाँ
बसाया गया है , ऐसा कहा जाता है
3. सोमत सिंह जी :- आपको दुदवड़ गाँव मिला हुआ
था , लेकिन इनका इतिहास ओर वंशज कोई मिला
नहीं शायद इनके वंसज नहीं हुए
4-5 . सावंत सिंह ओर सुरताण सिंह जी :- इनके बारे
मे कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई ओर वंसज भी नहीं
है
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प्रताप सिंह जी के जागीर गाँव
1. पितामाह दामा जी से इनको पारम्परिक गाँव तिंवरी
मिला , जो कि राव जोधाजी ने दामा जी को दिया था
बाद मे मूलराज जी के बाद प्रताप सिंह जी को विरासत
मे पिता द्वारा मिला था ,
2.3.4. बांकाली , मांडहाई , ओर गौंवा यह गाँव दामा जी
को मिले थे ओर बाद मे मूलराज जी के बाद प्रताप
सिंह जी को विरासत मे मिले
पिता श्री मूलराज जी के कुछ गाँव प्रताप सिंह जी को
विरासत मे मिले हुए थे ,निम्नलिखित गाँव
1. भैसेर कोटवाली .2.भैंसेर खुतडी . 3 ढ़ण्ढ़ोरा .
4. तोडीय़ाणा . 5. भटनोखा 6. खेड़ापा
7. बाड़ा खुर्द , 8. मालूँगो .प्रमुख थे ओर भी हो
सकते है
प्रताप सिंह जी को मिले हुए गाँव
1. चेलावास , 2. धंवलासर .3 मोहवा
प्रताप सिंह जी के पास लगभग 16 गाँव थे , बाद मे सभी
गाँव उनके पाटवी पुत्र
कल्याण सिंह जी के हूए ,
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नानिहाल :- इनके पिता जी मूलराज जी ने तीन विवाह
किये थे ,
1. अजारी . 2. सांथु 3. उण
इनका नानिहाल गाँव नही लिखा है
वैसे तीनो गाँव ही नानिहाल है
